आरक्षण की जरूरत कब तक?

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  1. आरक्षण की जरूरत कब तक?
आरक्षण का कांटा लगाता नेता
समाज और राजनीति को प्रभावित करता आरक्षण।

भारत की राजनीति वोट बैंक  पर टिकी है और वोट बैंक जाति पर।आरक्षण की जरूरत इसी जातिवाद की उपज  है आरक्षण।आरक्षण आज जितना कमजोर और वंचित तबके के लिए जरूरी बन गया है,उससे अधिक ये राजनीतिक दलों के लिए भी नकदी फसल के समान बन चुका है।जाति जहाँ सामाजिक व्यवस्था की देन है तो आरक्षण संवैधानिक व्यवस्था की।समाज में धीरे-धीरे ही सही बदलाव आते रहे हैं,और संविधान में भी संशोधन का प्राविधान है।राजनीति और जाति दोनों में गहरा रिश्ता है।राजनीति से लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं तो जाति से धर्म और समाज की।इसमें ये जोड़ा जाए कि आरक्षण से वंचितों की जड़े मजबूत हो रही हैं तो उचित ही होगा ।आज आरक्षण घर्षण की तरह एक आवश्यक बुराई बन चुकी है।ये आज ऐसा चर्चित शब्द बन चुका है कि, कुछ लोग इसको सुनना तक कष्टकारक मानते हैं और देश की आबादी का एक तिहाई तबका इसको बरदान समझने लगा है।

      भारतीय समाज मे जाति प्रथा/वर्णव्यवस्था का जितना लंबा इतिहास रहा है और उतनी ही गहरी पीड़ा  और अपमान,भेदभाव, शोषण, असमानता का दंश भी इस तबके ने झेला है।एक सच्चाई ये भी है कि जिस तरह  अस्पृश्यता शोषण जातिवाद संपूर्ण देश के कोने कोने पर व्याप्त है आरक्षण का लाभ उस अनुपात में इस समुदाय  को अभी तक मिला नहीं है। अभी पूर्ण रुप से देश का शोषित और वंचित वर्ग आरक्षण युक्त हो भी नहीं पाया है और भारत को आरक्षण मुक्त करने की या इसकी समीक्षा करने की आवाज उठने लगी है, जिससे इस वर्ग में आरक्षण को लेकर चिंता उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आरक्षण चूंकि सरकारी सेवाओं और राजनीति में ही लागू है ।सरकारी नौकरी के लिए उच्च शिक्षित होना जरूरी है। और अभी देश ही शत-प्रतिशत शिक्षित  नहीं हो पाया है तो दलितों का क्या हाल होगा? आरक्षण खत्म करने से पहले निरक्षरता और जाति आधारित भेदभाव और शोषण को खत्म करने की पहल होनी चाहिए। 

       आरक्षण विरोधी विचारधारा के कुछ लोग इसको समाज के लिए घातक वायरस तक की संज्ञा देने लगे हैं मगर सिर्फ संज्ञा देने से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। अगर यह वायरस है तो इसका टीका भी हमको ही मिल जुलकर खोजना होगा ।5000 वर्षों का सामाजिक विघटन और सामाजिक असंतुलन जिसमें वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा ने एक वर्ग विशेष को समाज की मुख्यधारा से, शिक्षा से, समानता से वंचित रखा हुआ हो, आज भारतीय संविधान ने उनको अपनी पुरानी स्थिति से उबरने का अवसर दिया है तो उनके इस अवसर की समस्या करना या खत्म करना पुनः इस तबके के साथ अन्याय होगा। ये भी हकीकत है कि जो देश में शोषित है वही कुपोषित भी ज्यादा है ।

      फल अभी कच्चा है कच्ची अवस्था में तोड़ने की कोशिश करना पेड़ की शाखाओं को भी प्रभावित कर सकता है। पका हुआ फल स्वयं ही बंधन से मुक्त हो जाता है आरक्षण का फल अभी कुछ ही पेड़ों में लगना शुरू हुआ है अभी तो आधी से अधिक बागों के पेड़ों  में इस फल को लगने का इंतजार है। इस फल को लगने दो और सींचो ,खाद डालो ताकि बहुत जल्दी संपूर्ण हिंदुस्तान के वंचित बागों में बेहतर फल लग सकें। और उन फलों से जो बीज निकले वह रेगिस्तान में उगने लगेगा, फिर खाद पानी देने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। जब समाज से ही राजनीति की सीडी शुरू होती है तो सामाजिक और राजनीतिक दोनों ओर से दलितों और उच्च वर्ग के हिंदुओं  के बीच गहरी होती जा रही है खाई पर सेतू बनाने के प्रयास अवश्य होनी चाहिए। अयोध्या विवाद को सर्वोच्च न्यायालय भी आपसी सहमति पर सुलझाने की सलाह देता है तो, छूत- अछूत का स्वधर्मी है और एक परिवार का मसला है। हमारे धर्म गुरु जितनी नसीहत अन्य धर्म को देते हैं सर्वप्रथम अपने धर्म के अंदर पनप रहे असंतोष के बारे में भी बहस और विचार-विमर्श होना चाहिए।

        लंबी बीमारी का इलाज भी लंबा ही चलता है। जैसे भारत को गुलामी से मुक्त होने में लगभग एक शताब्दी तक संघर्ष करना पड़ा पराधीनता से मुक्त हो गए, मगर मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो सके। गांधी जी ने कहा है “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में ये बात  फिट बैठती है ।हमको जातिवादजातिवाद,रूढ़िवाद, अंधविश्वास,भेदभाव से घृणा करनी चाहिए न कि आरक्षण से। जब तक जाति के बोझ को भारतीय समाज ढोता रहेगा सायद तब तक आरक्षण की जरूरत भी बनी रहेगी ।इतना ही नहीं जब तक” ढोल गवार शुद्र पशु नारी सब ताड़न के अधिकारी” वाली सोच समाज में जीवित है शायद तब तक आरक्षण की जरूरत भी बनी रह सकती है। ऐसा भी नहीं कि हमारे समाज से कुरीतियों  का अंत नहीं हुआ है कई उदाहरण हैं जिनमें सती प्रथा ,बाल विवाह प्रथा, दहेज प्रथा,बलि प्रथा आदि का अंत हुआ है। ये सभी प्रथाएं आजादी से पहले ही खत्म हो चुके थे। मगर अब सवाल ये है कि आजादी के बाद हम न तो वंचितों ,दलितों, महिलाओं, पिछड़ों, आदिवासियों, जनजातियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ पाए हैं और नहीं जाति के बंधन को तोड़ पाए हैं। जब तक समाज इस वर्ग को पूर्णतः हिन्दू होने के सारे अधिकार प्रदान न कर दे यह व्यवस्था बनी रहनी चाहिए।जब तक सवर्ण और अवर्ण का भेद भारतीय समाज में व्याप्त  है,जब तक छूत-अछूत,स्पृश्य-अस्पृश्य का बोलबाला व्याप्त है सायद तब तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी।

   जैसा कि सतयुग के बारे में कहा जाता है -जब बाघ और बकरी एक साथ पानी पीते थे।आज हमको भी मानव होने के नाते इस सम्बंध को बनने तक का इंतजार करना चाहिए।दलित वर्ग निम्न पायदान में ही सही मगर वैदिक काल से ही समाज का चौथा स्तम्भ बनकर हमेसा सेवा करता रहा है।इसलिए उनको उचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए।सिर्फ गरीबी ही आरक्षण का आधार नहीं मानी जा सकती है,इसमें सामाजिक पिछड़ापन और पर्याप्त प्रतिनिधित्व को भी देखा जाना चाहिए।

      आरक्षण भोगियों को भी नई पीढ़ी को धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा के युग में आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम करने की आदत डालनी चाहिए।आज हम सूचना क्रांति और डिजिटल युग मे प्रवेश कर चके हैं।2जी से शुरू हुआ इंटरनेट आज 5जी तक पहुंच चुका है।ऐसे में उनको ये समझना होगा कि बहुत लंबे समय तक सिर्फ आरक्षण के सहारे ही आगे नहीं बढ़ सकते।वंचितों को भी प्रतिस्पर्धा के विलायक में घुलने की आदत डालनी चाहिए।जिस दिन देश का दलित और वंचित वर्ग हिंदुत्व के विलयन की संतृप्त अवस्था को प्राप्त कर लेगा आरक्षण की जरूरत स्वतः ही खत्म हो जाएगी।और इसमें संदेह की वह खुद ही आरक्षण की वैशाखी को फेंक देगा।उस दिन ये अपेक्षा की जानी चाहिए कि जाति के नाम पर भी श्रेष्ठता और निम्नता भी समाप्त होने की ओर अग्रसर होगी।

 

आई0 पी0 ह्यूमन

स्वतन्त्र स्तम्भकार


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