डिजिटल इंडिया दलित भारत?

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Iphuman

भारत कृषि प्रधान देश में कंप्यूटर प्रधान देश बनने की ओर अग्रसर है. कंप्यूटर का जब देश में आगमन होने की चर्चाएं थी कहीं स्वागत तो कहीं विरोध के स्वर उठे थे .समय-समय पर देश में बेहतर जीवन यापन के लिए कई कदम उठाए गए जिनमें हरित क्रांति ,श्वेत क्रांति, पीली क्रांति ,नीली क्रांति प्रमुख  हैं.  साथ ही    डिजिटल इंडिया में दलित भारत भी एक विमर्श का विषय बना हुआ है.

हरित क्रांति पूर्ण रूप से आज तक सबको भरपेट खाना नहीं दे पाई है. कृषि प्रधान देश में जहां किसान बदहाली के दौर से गुजर रहा है, दुग्ध उत्पादन में भारत विश्व में पहले स्थान पर होने के बाद भी देश के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं .मानव विकास सूचकांक जो स्वास्थ्य शिक्षा एवं आय के स्तर के आधार पर तैयार किए जाने वाला संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी )का सूचकांक है 187 देशों की सूची में भारत 2019 की रिपोर्ट में 139 नंबर पर है. डिजिटल इंडिया बेहतर भविष्य और समाज के लिए एक क्रांतिकारी कदम है.

 

डिजिटल इंडिया दलित भारत।
21वीं सदी में भी वैदिक हाल में दलित।

इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से देशवासियों का जीवन स्तर अवश्य ही प्रभावित होगा .इसी के साथ साथ हम को बेहतर जनजीवन के लिए अन्य क्षेत्रों में भी एनालॉग तरीके को छोड़कर लॉजिकल तरीके से डिजिटलाइजेशन करने की जरूरत है. कई क्षेत्रों में भी सुधार करने ,ध्यान देने और सजग रहने की आवश्यकता महसूस की जा रही है.

हम शिक्षा का अधिकार अधिनियम  तो लाये हैं लेकिन साक्षरता प्रतिशत में अभी भी ग्रामीण भारत के 35% से ज्यादा लोग निरक्षर हैं .राजस्थान में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है और उत्तर प्रदेश में हर तीसरा व्यक्ति निरक्षर है .21वीं सदी में बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. “आवश्यकता आविष्कार की जननी है” आज के सभ्य और विकसित मानव सभ्यता के लिए यह कथन उचित प्रतीत होता है .आदिकाल के मानव की आवश्यकता से ही आग की खोज हुई .पहले पत्थर के फिर धीरे-धीरे धातुओं के हथियारों का आविष्कार हुआ.क्रमशः मानव नग्न अवस्था से गुजरता हुवा गुफाओं से महलों तक पहुंचा है. कहा जाता है कि भारत के वेदों में विज्ञान का भंडार भरा हुआ था. मैक्समूलर ने वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया था. चरक संहिता, धन्वंतरी ,आयुर्वेद और शून्य की खोज  ,भारत की देन है. भारत ज्ञान का गुरु था, मगर विज्ञान का नहीं? भारत अध्यात्म का गुरु तो रहा लेकिन फिजिक्स में बहुत पीछे रह गया.ज्योतिषाचार्य तो पैदा हुए, लेकिन कॉपरनिक्स,आइंस्टीन,न्यूटन जैसे वैज्ञानिक पैदा ना हो सके.

गर्व की बात है कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सपेरों का देश को डिजिटल इंडिया में तब्दील करने को आतुर हैं .जो संदेश के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है .कभी आर्यव्रत,कभी हिंदुस्तान, कभी भारत ,कभी इंडिया के रूप में इस महान भौगोलिक भूभाग पर इतिहास लिखा गया और आगे भी लिखा जाता रहेगा. हम तकनीक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इतने पीछे न होते अगर अतीत में हमने रुढ़िवादिता को विज्ञान से ऊपर न रखा होता.इतिहास के विभिन्न  कालखण्डों  का चित्रण  नहीं करना चाहता हूं ,मगर  स्मरण जरूरी है .

      आजादी के बाद महात्मा गांधी चरखा और देशी कुटीर उद्योगों से ही देश का विकास करना चाहते थे. पंडित नेहरू विज्ञान और तकनीक को देश में लाए .राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर और सूचना क्रांति लाई आज उसी क्रम में तीसरी पीढ़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो कदम आगे निकलकर “डिजिटल इंडिया “बनाने की ओर अग्रसर हैं. जो अवश्य ही  वक्त  की कसौटी पर तोला जाएगा .डिजिटल से दुनिया तक का सफर तो तय किया जा सकता है ,लेकिन तीन पीढ़ियों के सफर के बीच में कई चीजें पीछे भी हम छोड़ आए हैं .भारत विभिन्नताओं का देश है .लेकिन संवैधानिक शक्ति से बड़ा कोई नहीं है .डिजिटल इंडिया में ही दलित सिग्नल भी निवास करता है .जो सदियों से सेवक था मगर वंचित और लाचार भी था. कुछ बिंदु पर सार्थक बहश देश के बुद्धिजीवी वर्ग के बीच में अवश्य ही होनी चाहिए .21वीं सदी के भारत में दलित वर्ग का डिजिटाइजेशन तो हो लेकिन पहचान डिजिटल दलित ना हो जाए .जैसा कि अक्सर सुनने में आता है फलाना दलित छात्र, दलित साहित्यकार ,दलित नेता ,दलित मुख्यमंत्री .यहां तक कि कभी-कभी पूरा गांव दलित बस्ती या दलित गांव के नाम से जाना जाता है .और सबसे बड़ी विडंबना तब होती है जब देश का प्रथम नागरिक ,राष्ट्रपति के पद पर रामनाथ कोविंद पहुंचते हैं तो पूरी दुनिया में मीडिया में यह लाइन बनती है कि भारत में दलित राष्ट्रपति बना  .जब अभी पूरा हिंदुस्तान शतप्रतिशत  शिक्षित नहीं हो पाया है. इस वर्ग  को अभी समाज में उपेक्षा का ही शिकार होना पड़ रहा है .तथा इस  दलित वर्ग की दशा और भी दयनीय है. जातीय विभाजन असमानता का कारण बनी हुई है .जाति के आधार पर त तो वर्गवाद है ही –ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र .अर्थात आधुनिक दलित .चिंता है कि कहीं एक और वर्ग पैदा न हो जाए. जैसे-  निरीक्षर, साक्षर, एनालॉग,और  डिजिटल  इसी प्रकार ग्रामीण, शहरी महानगरी , तथा  स्मार्ट सिटीजन.इन सभी मेंं देखा जाए तो दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व न्यूनतम ही होगा ,तथा  कहीं  कहीं  शून्य भी हो सकता है .  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देेश का दलित वर्ग भी उनसे उम्मीदें पाले बैठा है,. प्रधानमंत्री के राजनीतिक कुशलता का  विश्व लोहा मानने लगा है. 21 जून को विश्व योग दिवश  मनाने को उनकी मन की बात को दुनिया ने स्वीकारा है. 25 करोड़ दलितों की मन की पीड़ा को भी अपने मन की बात द्वारा जन -जन तक जरूर पहुंचाएं तभी डिजिटल इंडिया तथा स्किल इंडिया का सपना साकार हो सकता है .

Iphuman.


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