धर्म परिवर्तन किसका और क्यों?

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By.iphuman

धर्म परिवर्तन किसका और क्यो?
सम्मान के लिए ऊना के दलितों ने किया धर्म परिवर्तन।साभार bbc

 

भारत की समस्याओं में सबसे ऊपर है जाति और धर्म पर होने वाली घटनाएं.जाति को लोग छोड़ना नहीं चाहते और धर्म को बदलने देना भी नहीं चाहते .सबसे ज्यादा आरोप मुसलमानों पर लगाये जाते हैं कि उन्होंने भारत में बड़ी संख्या में जबरन  धर्म परिवर्तन कराया।अंग्रेज जब भारत में थे उन पर भी ऐसे ही आरोप लगते थे.प्रश्न उठता है कि आखिर धर्म परिवर्तन किसका और क्यों?हुवा और किस वर्ग का हुवा.

    मुगलों ने बहुसंख्यक हिंदुओं  की संस्कृति पर प्रहार किया जैसा कि भारत के इतिहास के विभिन्न लेखकों की पुस्तकों से प्रतीत होता है .जिसमें रोमिला थापर की पुस्तक “भारत का इतिहास ” इस संदर्भ में विस्तृत प्रकाश डालती है. मुगल कालीन शासक अकबर से पहले तक के शासकों का इस्लाम के उलेमाओं मौलवियों से बेहद करीबी संबंध होते थे राजत्व का दैवीय सिद्धांत जो हिंदुओं का प्राचीन राजतंत्र का सिद्धांत था मुसलमानों ने भी उसी सिद्धांत का अनुसरण किया.

      मुसलमानों के भारत में आगमन से लेकर वर्तमान तक इस्लाम धर्म  हमेशा ही अल्पसंख्यक धर्म रहा है आज भी अगर भारत और पाकिस्तान एक साथ भी होते तो फिर भी भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक होते इसलिए बार-बार यह कहना कि मुसलमानों ने जबरदस्ती हिंदुओं का धर्मांतरण किया तर्कसंगत नहीं लगता. पूर्ण रूप से इस तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता है कि मुसलमानों ने धर्मांतरण नहीं करवाया. मगर यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि आखिर  हिंदू समाज में  धर्म परिवर्तन किसका और क्यों?हुवा और किस वर्ग का हुवा।

और क्यो?हुआ या किस जाति का हुवा.” हाथ कंगन को आरसी क्या” वाली कहावत इस आशंका  को भी दूर कर देती है. मुगल काल में क्यों और कैसे धर्मांतरण हुआ इसके लिए मुगलों की तानाशाही या क्रूरता को कारण माना जा सकता है. मगर आजादी के बाद भी आज लगातार हिंदू धर्म से दलित वर्ग के लोग पलायन कर धर्मांतरण कर रहे हैं और वह इस्लाम नहीं बल्कि बौद्ध धर्म की शरण में जा रहे हैं.

         14 अक्टूबर 1956 को देश के संविधान निर्माता  भारत रत्न डॉ भीमराव अंबेडकर ने लाखों लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया. क्या इसके लिए मुगलों को दोषी ठहराया जा सकता है या अंग्रेजों को दोषी ठहराया जा सकता है? अंबेडकर के धर्म परिवर्तन के लिए न इस्लाम और न हीं  अंग्रेजों का कोई दोष नजर आता है -इस पर एक हिंदी फिल्म के गाने के बोल बिल्कुल फिट बैठते हैं कि–”हमैं तो अपनो ने लूटा ग़ैरों में कहाँ दम था”.डॉ0 अम्बेडकर और दलित समाज को जितना अपमानित और प्रताड़ित खुद अपने धर्म और समाज से होना पड़ा, उतना इस वर्ग को न मुगलों ने न अंग्रेजों ,पुर्तग़ालयों,और  न अन्य किसी धर्म ने किया.

           आज जब भारत को आजाद हुए 7 दशक के ज्यादा हो गए हैं धर्मांतरण गुणोत्तर क्रम में जारी है, और धर्मांतरण कराने वाले न तो मुसलमान हैं और न ही  ईसाई .आज हिंदुत्व की नाभिक से इलेक्ट्रान अपने हिंदुत्व  की स्थाई कक्षाओं को छोड़कर बुद्धत्व की कक्षाओं में प्रवेश कर रहे हैं, और जो इस नाभिक के वंचित और शोषित परमाणु हैं जिनको नाभिक से कभी भी स्थाई रूप से अन्य तीन कक्षों के इलेक्ट्रानों के  समान ऊर्जा प्रदान नहीं की गई कि, वो अगली कक्षा में जम्प कर सके. इसीलिए सायद आज भी दलित वर्ग से निरंतर लोग बौद्ध धर्म की ओर पलायन कर रहे हैं. भारत को अगर अपनी सामाजिक संरचना हिंदुत्व के नाभिक को विखंडन होने से बचाना है तो सर्वप्रथम उसको परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक मॉडल को समझना होगा, और इसके लिए मनु  मॉडल और जाति के मॉडल को धक्का देकर आधुनिक विज्ञान और प्राचीन बौद्ध कालीन ज्ञान को समझना होगा .जिससे भारत कि सामाजिक मानसिकता पर काल्पनिक मान्यताओं की लगी जंग मिट सकती है.

        भारत को फिट रहना है तो समाज को भी फिट रखने की जरूरत .सिर्फ नारों से स्थिति में बदलाव होना संभव नहीं दिखता,इरादों में और नियति में भी स्वच्छता होनी चाहिए.कितना क्रांतिकारी और मन को सकूँन देने वाली बात होती कि जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती पर साबरमती से ऐलान किया कि “खुले में शौच से मुक्त हुवा देश”ऐसी ही घोषणा अगर होती कि ” जातिवाद से मुक्त हुवा देश”तो इससे ज्यादा विश्व गुरु क्या बन सकता था भारत जो हजारों सालों से जाति और असमानता के बोझ से मुक्त हो जाता!

मगर ऐसा कभी होगा भी ये यक्ष प्रश्न भारत के सामने हमेशा बना रहेगा.

         


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