नरेन्द्र मोदी की अभिलाषा:प्रेम तीर्थ से मन की बात तक

नरेन्द्र मोदी जी बच्चपन में चाय बेचा करते थे ये बात सिर्फ राजनैतिक है या हकीकत कुछ कहा नहीं जा सकता है.मगर ये बात शत-प्रतिशत हकीकत है कि युवावस्था में नरेंद्र मोदी ने कई कहानियां लिखी हैं.उनके कहानी संग्रहों को “प्रेमतीर्थ”पुस्तक में प्रकाशित किया गया है.प्रेम तीर्थ पुस्तक में कुल 8 कहानियां हैं.जिनमें अभिलाषा एक मार्मिक कहानी है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कांग्रेस और विपक्ष पर अपने भाषणों से प्रहार करते हैं तो बहुत कठोर नजर आते हैं.मगर उनकी अभिलाषा जैसी कहानियों को पढ़कर उनके मन की संवेदनसीलता का पता चलता है-प्रेम तीर्थ से लेकर

मन की बात तक नरेन्द्र मोदी के अंदर एक साहित्यकार भी छुपा दिखाई पड़ता गए.

नरेन्द्र मोदी यदि राजनेता नहीं होते तो.

इस कहानी को पढ़कर मन में एक विचार उतपन्न होता है .यदि नरेन्द्र मोदी राजनेता नहीं होते तो गुजराती भाषा को एक सशक्त कहानीकार मिला होता .नरेन्द्र मोदी जी की किताब प्रेमतीर्थ की एक कहानी अभिलाषा

पढें पूरी कहानी .

नरेन्द्र मोदी की कहानी “अभिलाषा”-

मनुष्य भी टूट जाता है. गोपाल राय के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ . कार दुर्घटना ने गोपाल राय के सपनों को कुचल डाला. दुर्घटना में पत्नी शोभा की मृत्यु हो गई और बेहोश गोपाल राय को अस्पताल में भर्ती कराया गया वह आने पर पत्नी की विदाई की बात सुनकर उसके मुख्य अचानक चीख निकली गोपाल राय का उस दिन का रोना ऐसा था कि किसी का भी ह्रदय दहल जाए. पास खड़े लोगों को इतना होश भी नहीं रहा कि उन्हें दिलासा दे पाते . सपनों के मुहाने पर खड़ा गोपाल राय का जीवन अब 15 वर्ष की अवनी और 12 वर्ष के बैजू के ही सहारे था.

गोपालराय ने इन दोनों के सहारे जीने का फैसला किया.उनका जीवन भी धीरे-धीरे एक दिनचर्या में आता गया.मशीन की तरह सुबह बैंक जाना, शाम को वापस लौटना और खाली समय को अब वे घर में ही गुजारते लगे.गोपालराय के नीरव जवन की यह मजबूरी थी,उनका ऐसा स्वभाव नहीं था.

प्रभा की मृत्यु को अब काफी समय गुजर गया.अवनी भी यौवन की दहलीज पर खड़ी थी.कॉलेज के प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी,इसके साथ घर की जिम्मेदारी भी संभालती थी. अवनी की जिम्मेदारी देखकर, उसके जाने के बाद घर का क्या होगा, इस चिंता ने गोपाल राय को नई दिशा में सोचने को मजबूर किया.प्रभा की मृत्यु के बाद अब तक दूसरे विवाह का निर्णय न करने वाले गोपाल राय अब सोचने लगी सगे.सगे- संबंधियों में भी इसकी चर्चा होने लगी. देखते-देखते सब कुछ निश्चित हो गया और सुनन्दा ने शोभा का स्थान ले लिया.

गोपाल राय के लिए सुनंदा शोभा हो सकती थी परंतु अवनी और बैजू के लिए? 18 वर्ष की अवनी और 28 वर्ष की सुनंदा दोनों सहेलियों जैसी दिखती थी, लेकिन नियति ने उन्हें मां बेटी के संबंध में जोड़ दिया था .

सुनंदा एक अच्छे घर की लड़की थी . विदेश जाने की इच्छा के कारण वह शादी की उम्र पार कर चुकी थी. अब अच्छा वर मिलना भी कठिन था.सभी अरमान मिट्टी में मिल जाएं,इससे पहले कुछ कर लेने की आकांक्षा ने उसे पत्नी और माता बनने को मजबूर किया.

गोपालराय तो सुनन्दा के प्रति सहज हो गए थे लेकिन अवनी-बैजु कटे-कटे ही रहते थे.अवनी ने तो कभी दिल खोलकर सुनंदा से बात भी नहीं कि.लगभग 1 महीना बीत चुका था लेकिन उसने एक बार भी सुनन्दा को माँ- मम्मी या मौसी कहकर नहीं पुकारा. अवनी काम जितनी ही बात है करती थी, वह भी ‘लो’ या ‘लाओ’ जैसे संक्षिप्त शब्दों में. सुनंदा को यह बात अखरती थी लेकिन उसने कभी गोपाल राय से इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा.’ सौतेली माँ’ के रूप में इस प्रतिज्ञा का पालन करना सरल नहीं था. वैसे तो अवनी और बैजू बाल मानस से आगे निकल चुके थे, पर उनके परिपक्व होने में अभी देर थी.वयः सन्धि की उनकी मनःस्थिति और शोभा की मृत्यु के बाद अड़ौसियों-पड़ौसियों से सौतेली माँ के बारे में सुनी कथाओं का उनके मन पर गहरा प्रभाव था,इसीलिए वे बात-बात में आहत हो जाते .शोभा की मृत्यु के बाद स्वतन्त्र रूप से जीने की आदत वाली अवनी और बैजु को सुनंदा की उपस्थिति उनकी स्वतन्त्रता पर अंकुश जैसी लगती…

सुनंदा का वात्सल्य।

नरेन्द्र मोदी की अभिलाषा

सुनंदा ने अवनी और बैजु को वात्सल्य-प्रेम में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.नवविवाहिता सुनंदा के लिए पत्नी रूप गौण हो गया था,माँ बनने के लिये कटिबद्ध हो गयी थी.वह अपने से बहुत अधिक छोटे नहीं ,ऐसे दोनों बच्चों को अपार प्रेम करती थी.लेकिन ,न जाने क्यों सुनंदा के इस प्रेम की अभिव्यक्ति उन्हें कृतिम कगति थी.इन दोनों को खुश रखने के लिए सुनंदा उन्हें तरह-तरह के पकवान बनाकर ख़िलाती थी….वे इन पकवानों को पेट भर तो खाते थे लेकिन मन भरकर कभी नहीं. भरे पूरे घर के डाइनिंग टेबल की चहल पहल मानो होटल के डाइनिंग टेबल जैसी लगती थी .जैसे सभी अनजान मुसाफिर एक जगह एकत्र हो गए हों. बच्चों का प्रेम पाने के लिए सुनंदा अविरत प्रयास करती रहती .बच्चों के कपड़ो की इस्त्री हो या बूट पॉलिश सब कुछ बड़ी तन्मयता से करती .उनके विकास के लिए उनके अध्ययन में रुचि लेती, उस बारे में पूछती थी. लेकिन यह सब बच्चों को अवरोधपूर्ण लगता था.

बैजु का जन्म दिन

सुनंदा के आने के बाद बैजु का पहला जन्म दिन आने वाला था.शोभा की मृत्यु से नीरस जीवन जीने वाले गोपालराय ने कभी अवनी या बैजु जा जन्मदिन नहीं मनाया था. मनाया क्या, कभी शुभकामना के 2 शब्द भी नहीं बोले थे. इतने लंबे अंतराल के कारण सुनंदा को बैजु का जन्मदिन मनाने की बहुत उमंग थी. 4 दिन पहले ही उसने उत्साह और उमंग के साथ जन्मदिन मनाने की तैयारियां शुरू कर दी. बैजू और अवनी के मित्रों को भी निमंत्रण देने को कहा. बैजू के मनपसंद सभी पकवान टेबल पर सजा दिए गए .लेकिन बैजुऔर अवनी का एक भी मित्र नहीं आया.वे चारों, चुप-चाप थोड़ा-बहुत खाकर वहाँ से अलग गए. सुनंदा कुछ भी न खा सकी. उसके लिए ये गहरा आघात था.आघात सहने के प्रयास में उसकी वेदना ,प्रकट हो जाती थीं.इस वातावरण ने गोपालराय के मन में शंका को दृढ़ कर दिया कि सुनंदा और बच्चों के बीच सम्बन्ध सहज नहीं हैं. गोपालराय ने उस रात सुनंदा के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की…फिर वह चुप रही. सुनंदा के लाख प्रयास करने पर भी घर का वातावरण और धुंधला होने लगा.

सुनंदा की चिंता औऱ अवनी।

सुनंदा को इस घर में आई 2 वर्ष हो चुके थे. गोपालराय के अलावा किसी के लिए वह शोभा नहीं बन सकी थी, उसे इस बात का बहुत दुख था. दूसरी ओर सुनंदा की जिम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही थी .कॉलेज में पढ़ने वाली अवनी का यौवन सोलह कला में खिला था. कालेज के उपरांत भी वह काफी समय बाहर ही रहती. मां के रूप में सुनंदा की चिंता स्वाभाविक थी .यह उसके लिए परीक्षा का समय था. पूरे दिन वह इसी चिंता में डूबी रहती.’ कहीं अवनी के जीवन में कोई दुर्घटना हो गई, तो उस दंश को सौतेली माता के कारण मेरी लापरवाही के रूप में ही माना जाएगा .तो क्या यह बात गोपाल राय को बता दूं? नहीं ..नहीं ऐसा नहीं करूंगी. अवनी बैजू को उनकी मां वापस मिल जाये, उसके लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया. उनका विकास हो इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी और.. और मातृत्व’ यहां आकर सुनंदा की विचार- श्रृंखला टूट जाती. वह फिर से अपने निर्णय को दृढ़ करती कि किसी भी कीमत पर वह शोभा की तरह अवनी बैजू के व्यक्तित्व को विकसित करेगी .

एक सुबह सुनंदा ने अवनी से कहा कि वह कालेज के अलावा अन्य कहीं बाहर नहीं जाया करे. सुनंदा ने अपना आग्रह स्पष्ट कर दिया था .पिछले 3 वर्षों के धुँधले वातावरण में सुनंदा की चेतावनी और अवनी के हठाग्रह ने सीधे संघर्ष के बीज बो दिए थे.अब तक अवनी सुनंदा के सामने कभी नही4 बोली थी,पर आज उसने सनसनाता हुवा जवाब दिया,मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ, जिसे तुम ऐसे रोक रही हो.अपने मन की मालुक हूँ मैं.अपना भला बुरा समझती हूँ. तुम मुझे क्या जवाबदेही सिखा रहे हो.और..और असज मेरी मम्मी होती तो इस तरह मुझे चरित्रहीन नहीं कहती….”अवनी विवेक गंवा बैठी थी.अब आक्षेप करने लगी.आवेश में उसने कह डाला “तुम्हें सन्तान नहीं होती,इसलिए हमसे ईर्ष्या होती है.”अब तक ह्र्दय पर पत्थर रखकर सुन रही सुनीता को अवनी के आखिरी वाक्य ने हिला डाला. वह बिल्कुल टूट गई, उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी. अवनी किस प्रकार की चिंता के बिना पैर पटकती हुई कॉलेज चली गई.

क्या सुनंदा का त्याग नहीं भांप पायी थी अवनी?

सुनंदा वहीं गिर पड़ी. अवनी का आखिरी वाक्य उसे मारे डाल रहा था. उसे इस बात की पीड़ा थी कि इन 3 वर्षों के अगाध परिश्रम के बाद भी उसे कोई नहीं समझ पाया.

स्त्री मातृत्व चाहती है यहां नंदा पिछले 3 वर्षों से मातृत्व देने के लिए खून पसीना एक कर रही थी. सुनंदा अभी निराश नहीं हुई पर हताश अवश्य हो गई थी. उसने पूरे दिन विचार मंथन किया. अपनी लड़की द्वारा ही बाँझपन के आरोप ने उसे सन्न कर दिया था. सुनंदा ने अवनी को वह बात बताने का निर्णय कर लिया ,जो उसने अब तक गोपाल राय को भी नहीं बताई थी .शायद अवनी उससे बात भी ना करे, यह सोचकर सुनंदा ने उसकी टेबल पर एक छोटा पत्र रख दिया .

सुबह से बाहर गयी अवनी ,गोपालराय के आने के कुछ समय पहले ही घर वापस लौटी थी.उसके मुख पर अभी गुस्सा ही था. वह सुनंदा की ओर देखे बिना अपने कमरे मे चली गयी.टेबल पर किताबें रखते हुए उसकी नजर एक बंद लिफापे पर पड़ी. पत्र निकालकर पढ़ने लगी.

प्यारी बेटी,

मेरी बहुत सी बातों का पिछले तीन वर्षो में अनादर ही हुवा है .इसलिए आज के अनादर का मुझे अधिक दुःख नहीं है. पर आज तुम बहुत उत्तेजित हो गयी.

बहुत हीनदृष्टि से तुमने मुझ पर बाँझ होने का आरोप लगा दिया.खैर ,इसमें भी तुम्हारा दोष नहीं है.

जिस सत्य का आजतक तेरे पिता को भी पता नहीं है,उसे तुझे बताना मेरे लिए अब अनिवार्य हो गया है .एक स्त्री के रूप में मातृत्व की अभिलाषा को तुम समझती होगी.

मातृत्व की अभिलाषा तो मुझे भी थी- आज से 3 वर्ष पहले तेरे पिता के साथ विवाह किया उस समय भी.तुझे और बैजु को देख कर मन पुलकित हो जाता था .तुम्हारे जैसे बच्चों की माँ बनने का सौभाग्य मिला था .तुम दोनों को ही सच्चे मन से मातृत्व दे सकूँ,इसलिए विवाह से पहले ही मैंने निर्णय कर लिया था, इसका पता तुम्हारे पिता को भी नहीं है. वह निर्णय था :इस जन्म में स्वयं कोई सन्तान उतपन्न न करके सिर्फ तेरी और बैजु की माँ के रूप में ही जिंदगी जीना और यह संकल्प तुम्हें प्राप्त करने के लिए भी किया था .अभी भी मातृत्व देनी की मेरी अभिलाषा तू समझ सकेगी.

थी बस इतना ही.

अपनी प्यारी बेटी की

सौतेली माँ-सुनंदा

पूरा पत्र पढ़ते ही अवनी के मुख से शब्द निकल पड़े-‘माँ….. माँ…’और वह दौड़कर सुनंदा से लिपट गयी…

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Sochbadlonow

I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

One thought on “नरेन्द्र मोदी की अभिलाषा:प्रेम तीर्थ से मन की बात तक

  • 5 July 2020 at 9:03 am
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    बहुत सुंदर जानकारी मोदी जी के विषय में।

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