आरक्षण पर पक्षपात क्यो?राजनीतिक आरक्षण पर मेहरबानी और परमोशन में आरक्षण पर बेरुखी क्यो?

राजनीतिक आरक्षण पर मेहरबानी और परमोशन में आरक्षण पर बेरुखी क्यो?

By Sbn.com

 

 

राजनीतिक आरक्षण
साभार हरिभूमि

हाल ही में केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए संसद तथा राज्य विधान सभाओं में सीटों को 10 वर्ष और आगे बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन विधयेक पारित किया है।और इसको राज्य सरकारों ने भी लागू कर दिया है।लेकिन इस वर्ग के कर्मचारियों को परमोशन में आरक्षण देने से कतरा रही हैं।राजनीतिक आरक्षण पर सरकार मेहरबान आखिर क्यों?

उत्तराखंड में अनुसूचित जाति जनजाति के सभी विभागों के कर्मचारी साल 2012 से अपनी मांगों को के लिए संघर्ष कर रहे हैं ।वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने प्रमोशन में आरक्षण को सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के दबाव में आकर खत्म कर दिया था। और प्रमोशन में आरक्षण की समीक्षा और बहाली के लिए इंदु कुमार पांडे की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी जिसकी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी गई थी लेकिन उस रिपोर्ट को सार्वजनिक किए बगैर पुनः सरकार ने पूर्व न्यायाधीश इरसाद हुसैन  की अध्यक्षता में एक और आयोग का गठन कर दिया ।

    मगर उस रिपोर्ट को भी तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया ।इस संबंध में एससी एसटी टीचर्स एसोसिएशन ने नैनीताल हाईकोर्ट में रिट दायर की लेकिन फिर भी आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।

 उत्तराखंड  में कभी कांग्रेस की  और कभी भाजपा की सरकारें बारी-बारी से सत्ता में आई लेकिन दोनों ही  सरकारें दोनों ही आयोगों की रिपोर्ट को निगल गयी , और प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा जस का तस बना  हुवा है।

   ज्ञात हो कि  हरिद्वार निवासी ज्ञानचंद द्वारा  उच्च न्यायालय नैनीताल में परमोशन में आरक्षण की बहाली के लिए दायर याचिका  पर 1 अप्रैल 2019 को नैनीताल हाईकोर्ट ने निर्णय देते हुए सरकार को प्रमोशन में आरक्षण जारी रखने को कहा ।लेकिन सरकार ने कोर्ट के आदेश को नकार कर पुनः रिव्यु याचिका दाखिल की है  

    ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि राज्य चाहे तो प्रमोशन में आरक्षण जारी रख सकते हैं 

अनुच्छेद 16 में अवसरों की समानता की बात कही गई है। 16(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उनके लिए पदों को आरक्षित कर सकता है।

      मगर उत्तराखण्ड सरकार परमोशन में आरक्षण के खिलाफ स्वयं सुप्रीम कोर्ट गयी है।ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है कि सरकारें पिछड़े वर्ग के संवैधानिक अधिकारों को लागू करेगी।

   लोकसभा में 117 वां संविधान संशोधन विधेयक विगत 6 सालों से लंबित है राज्यसभा में पारित होकर भी इस विधेयक को सरकार संसद में नहीं ला रही है ।और जबकि सवर्ण गरीबों को 10% आरक्षण का विधेयक 124 संविधान संशोधन के द्वारा पारित कराकर उसको समस्त राज्यों में लागू भी कर दिया है। ऐसे में कर्मचारियों के सामने आंदोलन के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता है। 

अनुच्छेद 330 के तहत संसद और अनुच्छेद 332 में राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं। सीटों को पुनः 10 वर्ष बढ़ाने के लिए संसद ने संविधान संशोधन पास कर दिया और राज्यों ने भी बड़ी ततपरता से इसको पारित कर दिया।दलित वर्ग के कर्मचारियों को सरकार परमोशन में आरक्षण क्यों नहीं देना चाहती है?जबकि संसद और राज्य विधान सभाओं में आरक्षण देने में कोई गुरेज नहीं !

      इतना ही नहीं उत्तराखण्ड सरकार का एक और दलित वर्ग विरोधी कदम भी इस वर्ग को सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के मार्ग में अवरोध खड़ा  करता है,वह कदम है नया रोस्टर।उत्तराखण्ड में लंबे समय से सरकारी विभागों में बैक लॉग के हजारों पद रिक्त हैं मगर सरकारों को कोई चिंता ही नहीं है।ऐसे में सबका साथ सबका विकास का नारा छलावा मात्र लगता है।एक ही वर्ग के आरक्षण पर पक्षपात क्यो कर रही है सरकार?राजनीतिक आरक्षण ओर सरकार मेहरबानी देखा रही है और नौकरी तथा प्रमोशन पर बेरुखी।

    जबकि राजनीतिक आरक्षण को संविधान में केवल 10 वर्ष के लिए रखा गया था।लेकिन सरकार हर 10 वर्ष बाद राजनीतिक आरक्षण को अगले 10 वर्षों के लिए बढ़ाती जा रही है जबकि,प्रमोशन और नौकरी में आरक्षण पर कैंची कजल रही है।

 

Sochbadlonow

I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

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