प्रार्थना कुमाउँनी:दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के विद्यालय में

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प्रार्थना :कुमाउँनी: दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के विद्यालय में

 

दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के विद्यार्थी।

 

 

 

 

भारत भक्ति भूमि , प्रार्थना,और आस्थाओं का देश है।घर हो,स्कूल हो,मंदिर,सभी जगह प्रार्थनाएं और भक्ति-भजन गाये जाते हैं।स्कूलों में तो पढ़ाई की शुरुवात ही प्रार्थना सभा से ही होती है। ऐसे ही उत्तराखंड का एक दुर्गम क्षेत्र का विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज द्यूनाथल है। जो जनपद अल्मोड़ा के धौलादेवी ब्लॉक में स्थित है ।दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के विद्यालय में सुबह की प्रार्थना कुमाउँनी भाषा में  मन्त्र मुग्ध कर देती है।

यहां की विषम भौगोलिक परिस्थिति में स्थित – है जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर यह विद्यालय, सुंदर बांज, काफल और बुरास के जंगल के बीच में स्थित है। यहां की मुख्य विशेषताओं में शुमार है। यहां की विशेष संस्कृति जो स्कूल में भी साफ दिखाई पड़ती है वो है  प्रार्थना कुमाउँनी  भाषा में।

बच्चों द्वारा रोज नई-नई प्रार्थना ,भक्ति गीत, और वंदना गाई जाती है ।जिसमें प्रार्थना  कुमाऊंनी भाषा में। विषम भौगोलिक परिस्थितियों का राज्य उत्तराखंड कई आपदाओं से समय-समय पर पीड़ित होता रहता है जैसा कि साल 2013 में केदारनाथ में आई भयानक त्रासदी ने पूरे विश्व स्तर पर उत्तराखंड को हाईलाइट कर दिया था। लेकिन फिर भी श्रद्धालुओं का आना यहां कम नहीं हुआ लोगों का मानना है कि भक्ति में ही इंसान का जीवन सफल हो पाता है और इसी भावना से ओतप्रोत होकर विद्यार्थी भी सुबह अपनी कक्षाएं शुरू होने से पहले मां सरस्वती से मां दुर्गा से भारत माता से आराधना करते हैं कि हमारा जीवन सुखी हो हमें अच्छी ज्ञान की प्राप्ति हो हम जीवन में सफलता की ओर निरंतर बढ़ते रहें ।इसी क्रम में यहां पहाड़ी या जिसे  कहा जाए कुमाऊनी भाषा में सरस्वती वंदना का गुणगान प्रार्थना के रूप में किया गया है ।जिसके बोल हैं “मां सरस्वती  दैण है जाए दैण है जाए माँ सरस्वती “कहने का तात्पर्य है कि माता सरस्वती तू हमारे लिए फलीभूत हो जाना और हमारा मार्ग प्रशस्त करना, हम तेरे मंदिर में पूजा पाठ करने आएंगे शीश झुकाने आएंगे तू जग का कल्याण करने वाली है, तू मानव का कल्याण करने वाली है  ,विद्या दान देने वाली है और प्राण दान देने वाली है।

      लेकिन आज के बदलते कंप्यूटर युग में  आध्यात्मिकता और सामाजिक बंधनों के बीच में एक खाई पैदा होती जा रही है इस खाई को भरने के लिए हम सब का यह कर्तव्य हो जाता है कि हम लुप्त होती जा रही अपनी पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों से भी काम बहुत आसानी से करा सकते हैं ।क्योंकि बच्चों के अंदर जल्दी ही सीखने की प्रवृत्ति होती है हमारे देखते-देखते  कई प्रकार की लोक गाथाएं ,परंपराएं ,लोक गायन लोकगीत, आदि का विलोपन हो चुका है जो ।एक जमाना ओ भी  था पहाड़ी क्षेत्रों में किसी भी शुभ अवसर पर ,किसी भी तीज त्यौहार पर चाहे वह पारंपरिक स्थानी मेले हो ,बारात  हो ,जनेऊ संस्कार हो, नामकरण संस्कार हो और यहां तक कि बरसात के मौसम में भी आठों – सातों के समय में झोड़ा चाचरी बड़े धूमधाम से गाया जाता था ।बड़े हर्ष उल्लास के साथ में महिलाएं और पुरुष -सयाने, बच्चे सभी बढ़-चढ़कर इस में भाग लेते थे और ।एक मुख्य गायक होता था जी  इस  झोड़ा-चाचरी  में चार चांद लगा देता था ।लेकिन आज के दौर में यह संस्कृति विलुप्त की ओर अग्रसर हो चुकी है। इसका स्थान आज कार्यक्रमों में, शादी ब्याह में डीजे और पॉप म्यूजिक ने ले लिया है ।जागा जागर भी विलुप्त की ओर है। न्योली, बैरी यह तो लगभग यह कहा जाए कि बीते जमाने की इतिहास की बातें हो गयी हैं ।

  विलुप्त होती जा रही पहाड़ी संस्कृति के पीछे पहाड़ो से पलायन तथा मोबाइल,टीवी,तथा आधुनिकता की दौड़ में भागम-भाग  का होना है।   सामूहिकता के साथ काम को नहीं करेंगे तो परंपराओं का विलोपन होना स्वाभाविक है। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से व्यक्ति विस्थापित होकर मैदानी क्षेत्रों की ओर आता है ।पलायन पहाड़ का व्यक्ति शौक से नहीं कर रहा है  अपितु  उसको दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं।

और वह शहरों में  बस कर  अपनी संस्कृति  को भूलकर अपने आप को  शहरी ,कल्चर में एक नई माहौल में ढालने का प्रयत्न करता है।  इसी का परिणाम आज दिखाई दे रहा है कि -सरकार भी चिंतित है ,पर्यावरण विद भी चिंतित है ,वैज्ञानिक भी चिंतित है कि इसी तरह से अगर पहाड़ से पलायन होता रहा तो एक समय  ऐसा आ जायेगा शहरों में जनसंख्या घनत्व अत्यधिक बढ़ जाएगा। और  स्थानीय संस्कृति और पहाड़ की परंपरागत चीजें सभी रेड बुक की श्रेणी में शुमार हो जाएंगे । न्योली,जागर,फैग, मालूशाही , गोलू ,भंडारी, गंगनाथ की वीरगाथा थी   सिर्फ इतिहास की किताबों में ही रह जाएंगी। अगर पहाड़ी  संस्सकृति और रीति-रिवाजों को जिंदा रखना है तो ,समाज के हर वर्ग को, सरकारों को, पत्रकारों ,साहित्यकारों को आगे आना होगा।

 


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