राजनीति

 

भारतीय राजनीति में जातीय समीकरणों की शिकार जातियां

 

 भारतीय समाज में जातिवाद की जड़ें तो वैदिक काल से ही जमी हुई हैं।मगर आजादी के बाद  भारतीय राजनीति में  जातीय समीकरणों का शिकार होती जातियाँ ,गरीब,किसान,दलित,सिर्फ मतदाता बनकर रह गया है।अग्रेजों के बारे में कहा जाता है कि, उन्होंने भारत में 200 वर्षों तक फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई और भारतीयों पर अपना प्रभुत्व कायम रखा ।भारत को गुलाम भी बनाए रखा और देशी रियासतों को आपस में लड़ा कर अखंड भारत के ढांचे को भी कमजोर करते रहे। यह भी सच है कि भारत की आंतरिक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्थाओं की  विभिन्नताओं ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक विदेशियों को भारत में अपने पैर जमाने का मौका दिया।भारतीय राजनीति में जातीय समीकरणों का शिकार  जातियां इस वक्त  अपने अस्तित्व को तलाश रही हैं।

    यह विडंबना ही होगी कि सिकंदर, मोहम्मद गजनी ,तैमूर लंग ,बाबर और फिर अंग्रेजों ने भारत को ही अपनी शक्ति और योद्धा साबित करने का गढ़ क्यों बना डाला? धार्मिक कट्टरता और जातिवाद के बढ़ते प्रभाव ने सम्राट अशोक और मौर्यकालीन भारत को जातीयता और क्षेत्रवाद पर लाकर खड़ा कर दिया ।इतिहास की कई ऐसी अनसुलझी हुई पहेलियां हैं जिनको कुदेर कर वर्तमान में विवाद पैदा करना लेखक की नासमझी ही मानी जाएगी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी भारतीय राजनीति में जाति विशेष और धर्म विशेष की लड़ाई शुरू हो चुकी थी। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर दलितों ,पिछड़ों और भारतीय समाज में भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ अपने ही स्वधर्मी  समाज से जूझ रहे थे तो, वही मुस्लिम नेता मोहम्मद अली जिन्ना भी धार्मिक कट्टरता के कारण अलग होना चाह रहे थे। और उन्होंने अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग भी कर डाली ,अंग्रेजों को फिर मौका मिला भारत को विभाजित करने का इस प्रकार 14 अगस्त 1947 की रात को ही पाकिस्तान को अलग राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र कर दिया गया।

 अभी भी भारतीय राजनीति  में जातिगत समीकरण  की ही राजनीति चलती आ रही है। जाति गत समीकरण के आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं ।मगर हकीकत में देश के पिछड़े, दलित ,और महादलित ही इसका शिकार नहीं हो रहे  हैं ,बल्कि फारवर्ड कास्ट भी इसका शिकार हुई है। इसमें कोई शक नहीं कि आजादी के 73 सालों तक सत्ता हमेशा फॉरवर्ड कास्ट के ही पास रही है ।मगर यह सवाल उठना भी स्वाभाविक ही है  कि उच्च वर्ग के लोग भी स्किल इंडिया और न्यू इंडिया के युग के दौर में भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रहे थे ,और जिसको मोदी सरकार ने पूरा भी कर दिया 10% गरीब सवर्णों को आरक्षण देकर। इसका अर्थ तो यही निकाला जा सकता है कि देश में गरीबी के उन्मूलन के लिए ठोस और सार्थक प्रयास नहीं हुए हैं।और न ही जातिवाद को मिटाने के प्रयास हुए हैं। ”

गंदगी नजरों में होती है.

 वरना कचरा बीनने वालों को तो,

 कचरे में भी रोटी नजर आती है”.

     भारतीय राजनीति के लिए जातियां और धर्म, गरीबी एक अच्छे प्लेटफार्म का काम करती हैं। हकीक़त में देखा जाए तो इन जातीय समीकरणों से राजनैतिक पार्टियां और नेता मजबूत होते जा रहे हैं, मगर जातियां अपनी असली अस्तित्व को तरस रहे हैं ।देश में आजकल असहिष्णुता ,मॉबलिंचिंग ,मंदिर, मस्जिद,गाय, ओउम पर जो बहस छिड़ी है कहीं वह इसी विभाजक राजनीति का तो परिणाम नहीं है? यह बहस का विषय बन सकता है।     अंतरिक्ष में  भारत के बढ़ते कदम विश्व पटल पर सुर्खियां बटोर रहा है। मगर हकीकत यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्था मानव विकास सूचकांक 2019 की रिपोर्ट में 108 देशों की सूची में भारत  130 वें स्थान पर है।डिजिटल इंडिया और न्यू इंडिया में भी मलिन बस्तियां मलिन ही हैं।क्या उनको भी मुख्य धारा में लाने के प्रयास सफल हो सके ?अगर नहीं तो क्यो? एक कड़वा सच ये  भी है कि दलित वर्ग का समाज आज भी मंदिर में प्रवेश के लायक नहीं बन पाया है सार्वजनिक स्थानों पर स्वर्ण समाज के साथ नल से पानी नहीं भर सकता है। दलितों का दूल्हा उच्च हिन्दू जाति के गांव से घोड़ी पर सवार होकर बारात  नहीं ले जा सकता है। महिलाएं भी मंदिरों में प्रवेश करने के अधिकार से वंचित हैं ।ताजा उदाहरण सबरीमाला मंदिर का है ।

      इन्हीं गलतियों से हमने ज्ञान के प्रतीक संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर को बहुत धर्म  परिवर्तन करते हुए देखा है ।जैसा कि पंडित नेहरू ने कहा था कि “हु लिव्स इफ इंडिया डाइज” हम इस कथन को इस  नजर से भी देख सकते हैं कि अपेक्षाओं से मजबूर होकर उपेक्षित वर्ग यदि विपरीत कदम उठाने को मजबूर होता है तो यह भारतीयता के लिए महान क्षति हो सकती है ।अगर भारत को डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी ,स्किल इंडिया ,और बुलेट ट्रेन का सफर करना है तो जातीयता पर आधारित राजनीति को त्याग कर निम्नांकित रेखाओं को मिटाने की ओर कारगर और ठोस कदम बढ़ाने की जरूरत है —

 1–गरीबी/ निर्धनता की रेखा





 

2– निरक्षरता की रेखा 

3– कुपोषण और भुखमरी की रेखा।

4– भ्रष्टाचार की रेखा 

5– जातिवाद/ क्षेत्रवाद और

6– स्वर्ण/अवर्ण के बीच  की रेखा ।

7–आमीर और गरीब के बीच की रेखा।

8–मंत्री और जनता के बीच की रेखा।

   गरीबों और वंचितों ,पिछड़ों,आदिवासियों बेरोजगारों  को केवल सपने दिखाकर और नीतियां अमीरों और उद्योगपतियों के लिए बनाकर हम किस प्रकार का नया भारत का निर्माण करना चाहते हैं? सपने गांव वासियों को दिखाई जाते हैं लेकिन स्मार्ट गांव नहीं मेट्रो शहर बनते हैं। अगर यह सच नहीं  तो गांव क्यों उजड़ रहे हैं? यह सच नहीं तो देश का अन्नदाता किसान आत्महत्या करने को मजबूर है क्यों है?युवा अपराध और नशे की लत में क्यो जकड़ रहा है? 

   स्वच्छ भारत केवल झाड़ू लगाकर ही नहीं बन पाएगा ,इसके लिए स्वच्छ राजनीति का होना भी वर्तमान दौर में अति आवश्यक हो गया है। समीकरणों को छोड़कर मूल प्रश्नों को हल करके चुनाव में जाना ही असली नियत और ईमानदारी की राजनीति होगी ।इसलिए आज  जरूरत है ।

सोच बदलने की  और भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण की  राजनीति के स्तम्भ को कमजोर करने की।

लेखक

आईपी ह्यूमन 

स्वतंत्र स्तंभकार

 

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