भारतीय साहित्य में द्वैतवाद-अपने ही मार्ग से भटकता भारतीय समाज

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1-अपने ही बनाये रास्ते  से भटकता भारतीय समाज

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है। किसी भी युग और काल की संस्कृति ,सभ्यता और विकास का ज्ञान तत्कालीन विद्वानों द्वारा रचित ,लिखित विभिन्न लेखों,अभिलेखों और धार्मिक ग्रंथों के द्वारा होता है। भारतीय संस्कृति प्राचीनतम संस्कृति मानी जाती है तथा हिंदू धर्म एक सनातन धर्म। 

        लेकिन आज विडम्बना   यह है कि हिन्दू धर्म को ईसाई मिशनरियों,इस्लाम,और बौद्ध धर्म से खतरा महसूस हो रहा है ।और भारतीय संस्कृति और सभ्यता को पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति से।भारतीय वेदांग और धर्मशास्त्र विश्व के साहित्य और दर्शन में काफी ऊंचा स्थान रखते हैं, लेकिन इन धर्मशास्त्र का गूढ़ अध्ययन किया जाए तो कहीं न कहीं कुछ ऐसी खामियां नजर आती हैं जो आज के वैज्ञानिक और डिजिटल क्रांति के युग  में स्वीकार नहीं की जा सकती हैं।

       विश्व के अन्य धर्म की तुलना में हिंदू धर्म सबसे प्राचीन है। ईसाई धर्म लगभग 2000 वर्ष पुराना इस्लाम धर्म लगभग 1500 वर्ष पुराना और  हिंदू धर्म लगभग 3500 वर्ष पुराना है लेकिन सनातन धर्म को ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ही चुनौती मिलने लग गई थी। इसी संस्कृति और धर्म में पैदा हुए गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी ने एक नए धर्म बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म की स्थापना कर डाली। कहने का तात्पर्य यह है कि इस धर्म की उत्पत्ति के कुछ वर्षों बाद से ही तत्कालीन समाज में विद्रोह की भावना जागृत होने लगी थी।इन लोगों ने जो नई विचारधारा का सूत्रपात किया वह उन लोगों द्वारा इसी धर्म के ग्रंथों और साहित्य में वर्णित रूढ़िवादिता और अंधविश्वास के विरुद्ध उठाई गई आवाज थी । वेदांग और धर्म शास्त्रों में ऋग्वेद सबसे पुराना ग्रंथ माना जाता है। यदि ऋग्वैदिक काल की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था का अवलोकन किया जाए तो उस काल की कुछ मुख्य व्यवस्थाएं और सिद्धांत आज के वैज्ञानिक और कम्प्यूटर युग में एक  मनगढ़ंत  रचना ही समझी जाएगी।

        उदाहरण के रूप में हम वर्तमान वर्ण व्यवस्था की उत्तपत्ति को ही लें ,ऋग्वेद के 10 वें मंडल के पुरुष सूक्त में जाति की उत्पत्ति इस प्रकार बताई गई है –ब्राह्मण की उत्पत्ति ईश्वर के मुख से, क्षत्रीय की भुजाओं, से वैश्य की पेट से तथा शुद्र की चरणों से ।यह तो बात सही है कि इनको ईश्वर की संताने तो कहा गया लेकिन इनमें इतनी दूरियां और विभेद पैदा कर दिए जो आज तक खत्म नहीं हुई है।

       भारतीय समाज ने अपनी वेदांगों और शास्त्रों में उल्लिखित प्रगति और विज्ञान के ज्ञान को तो नहीं अपनाया अपितु, संकीर्ण विचारधारा और परंपराओं का अनुसरण किया। परिणाम स्वरूप भारतवर्ष आर्थिक और विज्ञान के क्षेत्र में अन्य देशों से पिछड़ गया।  ये कहानी गढ़ दी गयी कि भारतीय दर्शनभारतीय साहित्य में द्वैतवाद और ज्ञान को पश्चिमी मुल्कों ने चुरा लिया, और हिंदुस्तान अपने ही द्वारा बनाए गए रास्तों में कहीं भटकता रहा।हिन्दू धर्म ने ही “बसुधैव कुटुंबकम” का संदेश विश्व को दिया लेकिन अपने ही कुटुंब को एक परिवार न समझकर उसको एक चौराहा बना दिया, जो अपने -अपने ही अस्तित्व को बचाने और ढूंढने का प्रयत्न कर रहे हैं न कि अपने प्राचीन अखंडता को ।यदि हिंदुस्तान ने कभी सचेत होकर अपनी शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दिया होता तो आज भारतवर्ष  इतनी गंभीर समस्याओं से ग्रसित नहीं होता।

        हमने अपने विद्यालयों में वही पाठ्यक्रम लागू किया है जो हमारे इतिहास को तो दोहराता है ,मगर त प्रगति शून्य। हमारे विद्यार्थी कबीरदास, तुलसीदास और जायसी आदि का साहित्य पढ़ते हैं लेकिन वे  भ्रमित हो जाते हैं। जहां कबीर दास जी प्रेम और एकता संदेश देते हुए कहते हैं कि-“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

 ढाई अक्षर प्रेम  का, पढ़े सो पंडित होय।”

अर्थात-  बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

 

वही तुलसीदास जी सुंदर कांड में इतना विरोधाभास  लिखते हैं “ढोल गवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी “यहीं से शुरू होती है हमारी शिक्षा और यहीं से समाज विभिन्न पन्थों और सम्प्रदायों में विभक्त होने लग जाता है।विद्यार्थी का क्या दोष है कि वह आगे चलकर कबीर पंथी बने या तुलसी,बुनियादी शिक्षा का तो आधार ही दोहरे मापदण्डों पर आधारित है।ये सब भारतीय साहित्य  में निहित द्वैतवाद के कारण ही उतपन्न होता है।

I.p.humam.

 


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