मन्त्रों के जाप से नहीं, यंत्रों से बनेगा भारत विश्व गुरु

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  8 अक्टूबर को भारतीय वायु सेना के स्थापना दिवश और दशहरे के दिन फ्रांस के शहर  बारडोक्स  में राफेल लड़ाकू विमान को “हैंडओवर सेरेमनी में फ्रांस ने भारत को सौंपा।विमान को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राफेल पर  “ओउम” लिखकर   तिलक,फूल औ नारियल चढ़ाये तथा राफेल के टायर के आगे नीबू भी रखे।21वीं सदी में हम फिर वही अंधविश्वास को दोहरा रहे हैं, जिसके कारण हम आज विज्ञान और तकनीक में इतने पीछे रह गए हैं।हमको ये अब अवश्य ही समझ लेना चाहिए कि मन्त्रों के जाप से नहीं यंत्रों से बनेगा भारत विश्व गुरु।

यंत्र के साथ मन्त्र जपते हुए रक्षा मंत्री।मन्त्रों के जाप से नहि यंत्रों से बनेगा विश्व गुरु भारत

राफेल की पूजा करते हुए रक्षा मंत्री। हमारे मन्त्रों का कोई खरीददार क्यों नहीं?
साभार-अमर उजाला

 

विश्व की प्राचीन सभ्यताओं के युग में भारत की सिंधु घाटी और हड़प्पा कालीन सभ्यता ने अपनी पहचान छोड़ी है. सिंधु घाटी के पतन के बाद वैदिक काल में भारत में वेद, पुराण, उपनिषद और ब्राह्मण ग्रंथों की रचनाएं हुई .इन ग्रंथों में देवताओं की   स्तुतियां और  मंत्र हैं. अध्यात्म और वैदिक ग्रंथों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत विश्व गुरु रहा होगा. मगर जिस प्रकार लगातार इतिहास के पन्ने विदेशी आक्रमणों से भरे पड़े हैं, उनको देखकर नहीं लगता है कि भारत कभी विश्व गुरु रहा होगा .हाँ इतना कहा जा सकता है कि यहां धन संपदा के भंडार अवश्य ही रहे होंगे ,जिस कारण विदेशियों की नजर यहां पड़ी. सभ्यताएं आती रही और जाती रही हैं .हर युग और हर सभ्यता में मानव ने कुछ न कुछ नए आविष्कार किए हैं .जिस समाज और सभ्यता  ने तत्कालीन परिवर्तन और विकास के साथ अपने को ढाला है वह समाज हमेशा प्रगतिशील और शक्तिशाली रहा है. चार्ल्स डार्विन का विकासवाद कहता है “सर्वाइवलऑफ द फिटेस्ट “(Survival Of the Fitest).अर्थात मौजूदा वातावरण के अनुकूल खुद को ढालने के बाद ही अस्तित्व संभव है.

मौजूदा दौर को  सभ्यता कहें या युग की संज्ञा दे या वातावरण कहें, विशुद्ध रूप से विज्ञान का युग है. अगर आधुनिक सभ्यता, जिसमें 21वीं सदी का इतिहास लिखा होगा और इस सदी को यंत्रों के युग के रूप में इतिहास में अवश्य ही लिखा होगा. उस वक्त जापान, कोरिया, चीन, अमेरिका, जर्मनी ,फ्रांस, रूस का नाम सबसे आगे होगा .

जापान ने 1945 में परमाणु बम के कहर से ऊबर कर उस विशाल त्रासदी को झेलकर देश को पुनः दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों में शामिल कर लिया. आज जापान भारत से यंत्र और अर्थव्यवस्था में कई गुना आगे निकल चुका है .तभी तो भारत बुलेट ट्रेन से लेकर महत्वपूर्ण तकनीक  जापान और अन्य देशों से खरीद रहा है. जापान ने इतनी तरक्की कैसे कर ली यह कोई चमत्कार या मंत्रों के दम पर नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में किए गए तकनीकी ज्ञान के द्वारा संभव हो पाया है .आज विज्ञान का युग है इस वक्त भी हम चूक गए और हमारी बुनियादी शिक्षा सिर्फ मंत्रों और तंत्रों तक ही  सिमट गई तो हम 21वीं सदी की प्रमुख वैज्ञानिक सभ्यता के युग में अपने को इतिहास में दर्ज करने में सफल नहीं हो सकेंगे.

शिक्षा ज्ञान के चक्षुयों  को खोलती है .भारतीय समाज चूंकि  अंधविश्वास से जकड़ा हुआ है .जोइसको विरासत में मिली है .आस्था और भक्ति स्कूल में पढ़ाई जाने वाली पाठ्यपुस्तक का हिस्सा न भी  बनाया जाए तो भी इसको बच्चा पैदा होते ही विरासत में खुद प्राप्त कर लेता है  आज जब जापान, अमेरिका, चीन का बच्चा खेल- खेल में रोबोट और अन्य यंत्रों को खोज रहा है तो हमारे देश का बच्चा पुतले और मूर्तियां बना रहा है .

    वर्तमान युग यंत्रों का है .हमारा देश मंत्रों ,पुराणों ,उपनिषदों और वेदों के आधार पर विश्व गुरु अवश्य रहा होगा. मगर आज हम सिर्फ मंत्रों और वैदिक रचनाओं के आधार पर विश्व गुरु का सपना नहीं देख सकते हैं. हम विज्ञान और तकनीकी शिक्षा, डिजिटल इंडिया,साइंटिफिक इंडिया के कांसेप्ट को ही बढ़ावा देकर आगे बढ़ सकते हैं. मंत्र तो भारत का अनपढ़ व्यक्ति भी बहुत अच्छी तरह जानता है. हमारी चुनौती है अनपढ़ व्यक्ति को यंत्र का ज्ञान देना और उसको अंधविश्वास और रूढ़िवाद से बाहर निकालना.

भारत विश्व के देशों के लिए बहुत बड़ा बाजार है यंत्रों की खरीदारी के लिए. मगर हमारे मंत्रों का कोई खरीदार ही नहीं मिला है विश्व में सदियों से आखिर क्यों? सैमसंग और सोनी जैसी कोरियाई  और जापानी कंपनियां भारत में अपनी पैठ जमा चुकी हैं. दक्षिण कोरिया की सैमसंग कंपनी नोएडा में अपना संयंत्र स्थापित किया है जिसके  उद्घाटन समारोह में भारत के प्रधानमंत्री ने दक्षिण कोरिया के  राष्ट्रपति का आभार जताते हुए कहा था कि यह कंपनी चार लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराएगी. आखिर इस छोटे से देश के सामने हमको क्यों झुकना पड़ा? और इन देशों की जैसी तकनीक का विकास भारत में क्यों नहीं हो पा रहा है ?दक्षिण कोरिया ने भी युद्धों और तानाशाही को झेलते हुए अपने को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था में खड़ा किया है .और 4 एशियाई  चीतों में से एक है. इसके पीछे क्या राज है? दक्षिण कोरिया की इतनी जल्दी प्रगति के शिखर पर पहुंच जाना और विकसित राष्ट्र बन जाना. इसके पीछे वहां की प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक तकनीकी शिक्षा का दिया  जाना है. यह पहला देश है जिसने पूरे देश ने  प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के लिए  फाइबर  ऑप्टिक इंटरनेट अधिगम की सुविधा उपलब्ध कराई है. इस प्रणाली का उपयोग करके दक्षिण कोरिया ने विश्व में सर्वप्रथम डिजिटल पुस्तकें विकसित की है. और जिनका देश भर में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में निशुल्क वितरण किया जा रहा है.

            भारत में भी शिक्षा का अधिकार कानून 2009 से लागू है. शिक्षा के क्षेत्र में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं कक्षा 1 से लेकर 8 तक निशुल्क पाठ्य पुस्तक  भी  वितरित की जा रही हैं.  हमारे देश में सैकड़ों विश्वविद्यालय हैं लेकिन विश्व स्तर पर हम अपनी उच्च शिक्षा की पहचान बनाने में सफल नहीं हो पाए हैं .बुनियादी शिक्षा को आधुनिक युग की मांग के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है. मात्र गौरवशाली अतीत की स्मरण करने से ,मन्त्रों के जाप से,हम आधुनिक कंप्यूटर और तकनीकी जमाने में अपने आप को विज्ञान और अर्थव्यवस्था में विकसित राष्ट्रों के समानांतर खड़ा नहीं कर पाएंगे. विज्ञान को सिर्फ जानना ही नहीं वरन विज्ञान के सिद्धांतों को मानना भी है, और समाज में वैज्ञानिक विचारधारा को भी जन्म देना है  जिस दिन हमारी शिक्षा प्रणाली पूर्ण रूप से आधुनिक रूप ले लेगी, अंधविश्वास मुक्त हो जाएगी ,राजनीति के हस्तक्षेप से मुक्त हो जाएगी उस वक्त भारत कई जटिल समस्याओं से भी मुक्त हो सकता है. इसमें जातिवाद एक प्रमुख समस्या है .बेरोजगारी कम हो जाएगी. अंधविश्वास के कारण बुराड़ी जैसी घटनाएं घटित नहीं होंगी तथा न कोई आसाराम  राम रहीम. रामपाल. दाती महाराज स्वामी चिन्मयानंद जैसे  दुराचारी ही  पैदा होंगे.इसलिए आज भारत को ये भली भांति जान लेना चाहिए कि सिर्फ मन्त्रों के जाप से नहीं,यंत्रों से बनेगा भारत विश्व गुरु..

iphuman

 


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1 thought on “मन्त्रों के जाप से नहीं, यंत्रों से बनेगा भारत विश्व गुरु”

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