विकिपीडिया की नजर में 1डॉ0 अम्बेडकर

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 डॉ0  अम्बेडकर और गाँधी

डॉ0 अम्बेडकर और गाँधी दोनों महान समाज सुधारक थे।मगर डॉ0 आंबेडकर और गाँधी के बीच कई क्षेत्रों में भारी मतभेद भी थे जो इस लेख से स्पष्ट हो जाएगा जो कि विकिपीडिया की नजर से लिखा गयाहै।

भीमराव रामजी आम्बेडकर[a] (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), डॉ॰ बाबासाहब म्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे।[1] उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माता थे

 

भीमराव रामजी आम्बेडकर

Dr. Bhimrao Ambedkar.jpg

युवा आम्बेडकर

राज्य सभा के सदस्य, बॉम्बे राज्य

पद बहाल

3 अप्रैल 1952 – 6 दिसम्बर 1956

राष्ट्रपति

राजेन्द्र प्रसाद

प्रधानमंत्री

जवाहरलाल नेहरू

भारत के प्रथम क़ानून एवं न्याय मंत्री

पद बहाल

15 अगस्त 1947 – सितंबर 1951

राष्ट्रपति

राजेन्द्र प्रसाद

प्रधानमंत्री

जवाहरलाल नेहरू

पूर्वा धिकारी

पद स्थापित

उत्तरा धिकारी

चारु चंद्र बिस्वार

भारतीय संविधान सभा की मसौदा समिती के अध्यक्ष

पद बहाल

29 अगस्त 1947 – 24 जनवरी 1950

श्रम मंत्री, वायसराय की कार्य-परिषद

पद बहाल

जुलाई 1942 – 1946

पूर्वा धिकारी

फ़िरोज़ खान नून

बॉम्बे विधानसभा के विरोधी राजनेता

पद बहाल

1937–1942

बॉम्बे विधानसभा के सदस्य

पद बहाल

1937–1942

चुनाव-क्षेत्र

बॉम्बे शहर

बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य

पद बहाल

1926–1936

जन्म

14 अप्रैल 1891

महू, मध्य प्रांत, ब्रिटिश भारत

(अब डॉ॰ आम्बेडकर नगर, मध्य प्रदेश, भारत में)

मृत्यु

6 दिसम्बर 1956 (उम्र 65)

डॉ॰ आम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक, नयी दिल्ली, भारत

समाधि स्थल

चैत्य भूमि, मुंबई, महाराष्ट्र

जन्म का नाम

भिवा, भीम, भीमराव

अन्य नाम

बाबासाहब आम्बेडकर

राष्ट्रीयता

भारतीय

राजनीतिक दल

  • शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन
  • स्वतंत्र लेबर पार्टी
  • भारतीय रिपब्लिकन पार्टी

अन्य राजनीतिक

संबद्धताऐं

सामाजिक संघठन :

  • बहिष्कृत हितकारिणी सभा
  • समता सैनिक दल

शैक्षिक संघठन :

  • डिप्रेस्ड क्लासेस एज्युकेशन सोसायटी
  • द बाँबे शेड्युल्ड कास्ट्स इम्प्रुव्हमेंट ट्रस्ट
  • पिपल्स एज्युकेशन सोसायटी

धार्मिक संघठन :

  • भारतीय बौद्ध महासभा

जीवन संगी

  • रमाबाई आम्बेडकर

(विवाह 1906 – निधन 1935)

  • डॉ॰ सविता आम्बेडकर

(विवाह 1948 – निधन 2003)

संबंध

आम्बेडकर परिवार देखें

बच्चे

यशवंत आम्बेडकर

निवास

  • राजगृह, मुम्बई
  • २६ अलिपूर रोड, डॉ॰ आम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक, दिल्ली

शैक्षिक सम्बद्धता

  • मुंबई विश्वविद्यालय (बी॰ए॰)
  • कोलंबिया विश्वविद्यालय (एम॰ए॰, पीएच॰डी॰, एलएल॰डी॰)
  • लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (एमएस॰सी॰, डीएस॰सी॰)
  • ग्रेज इन (बैरिस्टर-एट-लॉ)

व्यवसाय

वकील, प्रोफेसर व राजनीतिज्ञ

पेशा

विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री,

राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्

दार्शनिक, लेखक

पत्रकार, समाजशास्त्री,

मानवविज्ञानी, शिक्षाविद्,

धर्मशास्त्री, इतिहासविद्

प्रोफेसर, संपादक

धर्म

बौद्ध धम्म

पुरस्कार/सम्मान

  • बोधिसत्व (1956)
  • Bharat Ratna Ribbon.svg भारत रत्न (1990)
  • पहले कोलंबियन अहेड ऑफ देअर टाईम (2004)
  • द ग्रेटेस्ट इंडियन (2012)

हस्ताक्षर

आम्बेडकर का दस्तखत

आम्बेडकर विपुल प्रतिभा के छात्र थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त कीं तथा विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में शोध कार्य भी किये थे। व्यावसायिक जीवन के आरम्भिक भाग में ये अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की तथा बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक बीता। तब आम्बेडकर भारत की स्वतन्त्रता के लिए प्रचार और चर्चाओं में शामिल हो गए और पत्रिकाओं को प्रकाशित करने, राजनीतिक अधिकारों की वकालत करने और दलितों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत और भारत के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।[8]

1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। १४ अप्रैल को उनका जन्म दिवस आम्बेडकर जयंती एक तौहार के रूप में भारत समेत दुनिया भर में मनाया जाता है।आम्बेडकर की विरासत में लोकप्रिय संस्कृति में कई स्मारक और चित्रण शामिल हैं।

प्रारंभिक जीवन

शिक्षा

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

पूना पैक्ट

मुख्य लेख: पुणे समझौता और गोलमेज सम्मेलन (भारत)

दूसरा गोलमेज सम्मेलन, १९३१; जिसमें आंबेडकर (दाये से पहले), गांधी, मालवीय व आदी लोग शामील थे

अब तक भीमराव आम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। आम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता महात्मा गांधी की भी आलोचना की, उन्होंने उन पर अछूत समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। आम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होंने अछूत समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनीतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों की ही कोई दखल ना हो। लंदन में 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन यानी प्रथम गोलमेज सम्मेलन के दौरान आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है।[13]

हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ… राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा… उनको शिक्षित होना चाहिए… एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।[13]

डॉ0 अम्बेडकर और गाँधी के बीच मतभेद

आम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की आलोचना की। उनकी अछूत समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में होने वाले दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भी, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। वहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर गांधी से तीखी बहस हुई, एवं ब्रिटिश डॉ॰ आम्बेडकर के विचारों से सहमत हुए। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज को विभाजित कर देगी। गांधी को लगता था की, सवर्णों को छुआछूत भूलाने के लिए उनके ह्रदयपरिवर्तन होने के लिए उन्हें कुछ वर्षों की अवधि दी जानी चाहिए, किन्तु यह तर्क गलत सिद्ध हुआ जब सवर्णों हिंदूओं द्वारा पूना संधि के कई दशकों बाद भी छुआछूत का नियमित पालन होता रहा।[46]

पूना पैक्ट :डॉ0 अम्बेडकर और गाँधी

1932 में जब ब्रिटिशों ने आम्बेडकर के विचारों के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की। कम्युनल अवार्ड की घोषणा गोलमेज सम्मेलन में हुए विचार विमर्श का ही परिणाम था। इस समझौते के तहत आम्बेडकर द्वारा उठाई गई राजनैतिक प्रतिनिधित्व की मांग को मानते हुए पृथक निर्वाचिका में दलित वर्ग को दो वोटों का अधिकार प्रदान किया गया। इसके अंतर्गत एक वोट से दलित अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे व दूसरी वोट से सामान्य वर्ग का प्रतिनिधि चुनने की आजादी थी। इस प्रकार दलित प्रतिनिधि केवल दलितों की ही वोट से चुना जाना था। इस प्रावधान से अब दलित प्रतिनिधि को चुनने में सामान्य वर्ग का कोई दखल शेष नहीं रहा था। लेकिन वहीं दलित वर्ग अपनी दूसरी वोट का इस्तेमाल करते हुए सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को चुनने से अपनी भूमिका निभा सकता था। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता।[47]

डॉ0 अम्बेडकर का राजनीतिकरण और दलित नेता

गांधी इस समय पूना की येरवडा जेल में थे। कम्युनल एवार्ड की घोषणा होते ही गांधी ने पहले तो प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसे बदलवाने की मांग की। लेकिन जब उनको लगा कि उनकी मांग पर कोई अमल नहीं किया जा रहा है तो उन्होंने मरण व्रत रखने की घोषणा कर दी। तभी आम्बेडकर ने कहा कि “यदि गांधी देश की स्वतंत्रता के लिए यह व्रत रखता तो अच्छा होता, लेकिन उन्होंने दलित लोगों के विरोध में यह व्रत रखा है, जो बेहद अफसोसजनक है। जबकि भारतीय ईसाइयो, मुसलमानों और सिखों को मिले इसी (पृथक निर्वाचन के) अधिकार को लेकर गांधी की ओर से कोई आपत्ति नहीं आई।” उन्होंने यह भी कहा कि गांधी कोई अमर व्यक्ति नहीं हैं। भारत में न जाने कितने ऐसे लोगों ने जन्म लिया और चले गए। आम्बेडकर ने कहा कि गांधी की जान बचाने के लिए वह दलितों के हितों का त्याग नहीं कर सकते। अब मरण व्रत के कारण गांधी की तबियत लगातार बिगड रही थी। गांधी के प्राणों पर भारी संकट आन पड़ा। और पूरा हिंदू समाज आम्बेडकर का विरोधी बन गया।[48]

डॉ0  अम्बेडकर और गाँधी :कम्युनल अवार्ड

देश में बढ़ते दबाव को देख आम्बेडकर 24 सितम्बर 1932 को शाम पांच बजे येरवडा जेल पहुंचे। यहां गांधी और आम्बेडकर के बीच समझौता हुआ, जो बाद में पूना पैक्ट के नाम से जाना गया। इस समझौते मे आम्बेडकर ने दलितों को कम्यूनल अवॉर्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की। लेकिन इसके साथ हीं कम्युनल अवार्ड से मिली 78 आरक्षित सीटों की बजाय पूना पैक्ट में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 148 करवा ली। इसके साथ ही अछूत लोगो के लिए प्रत्येक प्रांत मे शिक्षा अनुदान मे पर्याप्त राशि नियत करवाईं और सरकारी नौकरियों से बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित किया और इस तरह से आम्बेडकर ने महात्मा गांधी की जान बचाई। आम्बेडकर इस समझौते से असमाधानी थे, उन्होंने गाँधी के इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। 1942 में आम्बेडकर ने इस समझौते का धिक्कार किया, ‘स्टेट ऑफ मायनॉरिटी’ इस ग्रंथ में भी पूना पैक्ट संबंधी नाराजगी व्यक्त की हैं। भारतीय रिपब्लिकन पार्टी द्वारा भी इससे पहले कई बार धिक्कार सभाएँ हुई हैं।[49]

राजनीतिक जीवन

धर्म परिवर्तन की घोषणा

संविधान निर्माण

आर्थिक नियोजन

दूसरा विवाह

बौद्ध धर्म में परिवर्तन

निधन

व्यक्तिगत जीवन

आम्बेडकरवाद

पुस्तकें व अन्य रचनाएँ

पत्रकारिता

प्रभाव और विरासत

लोकप्रिय संस्कृति में

फिल्में और धारावाहिक

पुरस्कार और सम्मान

समर्पित स्मारक और संग्रहालय

गांधी से संबन्ध एवं विचार

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1. नोट

बाहरी कड़ियाँ

Last edited 2 days ago by AshokChakra

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