सपनों का उत्तराखंड

पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के हित में ही उपयोग हो जल जंगल और जमीन पर उत्तराखंड के लोगों का ही हक हो ऐसी सोच और जन भावनाओं के साथ स्वतंत्रता से पहले ही पृथक पहाड़ी राज्य की महक यहां के कुछ चिंतनशील बुद्धिजीवियों और सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों को समझने वाले क्रांतिकारी लोगों द्वारा उठाए जाने लगी थी सन 1929 में ही श्री देव सुमन ने गणित देश सेवा संघ संगठन के माध्यम से प्रथम बार फिर तक पर्वती राज्य की मांग उठाई थी आजादी के बाद से लेकर पृथक राज्य आंदोलन तक इस देवभूमि ने सैकड़ों युवाओं की कुर्बानियां दी है कालू मेरा जहां उत्तराखंड के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में इतिहास में उत्तराखंड के गौरव हैं वहीं पृथक राज्य आंदोलन के दौरान हमने निर्मल पण्डित जैसे युवा क्रांतिकारी शक्ति को खोया है जिसने उत्तराखंड में शराबबंदी और खनन माफियाओं के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी यह भूपाल चाहे गोरखा अंग्रेजों के अधीन रहा हो या आजादी के बाद उत्तर प्रदेश का अंग यहां के लोगों का और प्राकृतिक संपदा का उपयोग पूर्ण रूप से यहां के लोगों के हित में हुआ वह ऐसा कहने की स्थिति में शायरी प्रदेश अभी नहीं हुआ है यही कारण शायद हो सकता है कि समय-समय पर यहां आंदोलनों की बाढ़ आती रही है वनों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की गौरा देवी हो या सन 1994 में पृथक राज्य की मांग को दिल्ली रैली में भाग लेने जा रही यहां की मातृशक्ति पर रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर पर पुलिस द्वारा अमानुष एक अत्याचार किया गया विडंबना यह है कि वह भाटिया आज देश की सत्ता तथा राज्यों की सत्ता का उपयोग यहां की जनता की भागीदारी से भी कर रहे हैं आज भ्रष्टाचार पूरे देश की समस्या बन चुकी है हमारा अल्पविकसित और शेष अवस्था से गुजर रहा प्रदेश भी समय-समय पर भ्रष्टाचार के नए नए वैज्ञानिक और सामाजिक तरीके निकाले गए यहां एक अनोखी घटना का जिक्र कर रहा हूं जो कंकड़ा बैल से संबंधित अल्मोड़ा के बढ़िया रेट लंगड़ा में एक बैल की दोनों कान पर खुली लगा कर लिया गया बाद में बैल की दोनों कान काट कर उसे दो बार मरा घोषित कर बीमा की धनराशि भी हड़प ली गई बैल को दिल्ली ले जाकर भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रयास किया गया 1980 के दशक में बेरोजगारी और नशा उन्मूलन के लिए यहां के क्रांतिकारी युवाओं द्वारा नशा नहीं रोजगार दो का नारा दिया गया आज क्या नारा पूर्ण हो पाया है इस पर चिंतन करने की जरूरत है यह लो यह न तो अतिशयोक्ति है और न ही किसी की निंदा जरा गौर करने की जरूरत है आज स्थिति यह कही जा सकती है कि शराब उत्तराखंड के शहर से लेकर गांव कस्बों तक अपनी पहुंच बनाने में सफल है भले ही हजारों गांव अभी क्या से क्यों न हो वह शराब से मस्त जरूर है सामान्य ज्ञान की किताब में प्रदेश मनीआर्डर अर्थव्यवस्था वाला राज्य है हड़ताल धरना और राजधानी के टँकीयों और टावरों पर चढ़ना क्या यहां के युवाओं और कर्मचारियों की नियति बन चुकी है या अनावश्यक रूप से विकास को रोकने की साजिश सजगता से विशेषण करने की भी आवश्यकता है तमाम पहलू पर नजर डाली जाए तो पृथक राज्य की मार्कशीट पर राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही नहीं रहा होगा मेरी नजरों में यहां की विशिष्ट पहचान और संस्कृति का संरक्षण करना भी एक कारण हो सकता है जिसके लिए गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग भी उतनी ही जोर से उठी थी जितनी प्रत्येक राज्य की या यूं कहा जाए कि भावनात्मक लगाव से ही राज्य आंदोलन का जहाज उड़ा है लेकिन पिछले दिनों एक लेख में देहरादून अंगद का पैर शीर्षक से एक एक पड़ा जो हकीकत को बयां करने वाला था 19 सालों में देहरादून का विकास निरंतर जारी है यहां तक कि स्मार्ट सिटी बनते बनते रह गया बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां एक दूसरे पर गैर सेंड के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी क्या यह सच नहीं जो स्थान एक जिला मुख्यालय तक नहीं बन पाया वह राजधानी के रूप में ही का एक अस्तित्व में आ पाएगा यह सोचती भास्कर गैर से ज्यादा राजनीति का मुद्दा गाय बन गई है यह विशेष अपराधियों से देखने का नहीं जन भावनाओं को भी समझने की जरूरत है यहां इस घटना से मुझे उत्तराखंड राज्य आंदोलन में शहीद हुए निर्मल कुमार जोशी उत्पन्न निर्मल पण्डित की सहादत याद आती है जिन्होंने नशा मुक्त उत्तराखंड के लिए याद कर डाला और मई 1998 को अपने प्राण की आहुति दे दी अब प्रश्न उठता है कि निर्मल पण्डित को कितना याद किया जाता है क्या उनके सपनों का उत्तराखंड अभी तक बन पाया है इस समय जब शराब और खनन माफिया उत्तराखंड सरकार पर हावी होकर पहाड़ को लूट रहे हैं तो पण्डित की कमी खलती है उनका जीवन उन युवाओं के प्रेरणा स्रोत है जो निस्वार्थ भाव से उत्तराखंड के लिए काम कर रहे हैं जल जंगल और जमीन ही यहां हमेशा से अस्तित्व का सवाल रहा है कहीं यह शक्ल की दूरियां दिलों की दूरियां बढ़ा दें यह प्रदेश वासियों के लिए चिंता का विषय यह भी जमीनी मुद्दा ही तकरार का कारण बना हुआ है यहां भी दलितों को बलि का बकरा बना कर राजनीतिक हथियार के रूप में जा रहे ऐसी चर्चाओं का बाजार आजकल घर में है जिस पर दलित वर्ग को अपने काम लेना चाहिए अफसोस इस बात का है कि किसी भी घटना को या तो सांप्रदायिक संघ दिया जाता है या दलित वर्ग से जोड़ दिया जाता है इसको समझने की जरूरत है जनता को यह सवाल भी पूछे गायक होना चाहिए कि इस वक्त गैर सेंड से ज्यादा तवज्जो नैनीताल कोई क्यों दी जा रही है कहीं वह घर से राजधानी के मुद्दे से ता का ध्यान मारने का तो विकल्प नहीं बन रहा है

Sochbadlonow

I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

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