सैनिक का अपमान:ये कैसा गुजरात मॉडल?

 

सैनिक का अपमान।ये कैसा गुजरात मॉडल
आर्मी जवान को घोड़ी से उतारा।
साभार-जनसत्ता

सैनिक का अपमान  देश और सेना का अपमान।

21वीं सदी में भी सोच में बदलाव नहीं।

अपने ही देश और समाज में सैनिक का अपमान बेहद शर्मनाक

देश की रक्षा और स्वभिमान के लिए देश का सैनिक अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।लेकिन जब किसी सैनिक का अपमान अपने ही देश और समाज मे किया जाता है तो सर शर्म से झुक जाता है।ऐसी ही शर्मनाक घटना गुजरात के बनासकंठा में 17 फरवरी  2020 को  घटित हुई।सांदीपाडा गांव के एक युवक आकाश कोटलिया की शादी के दौरान ऊंची जाति के लोगों ने घोड़ी पर चढ़ने से रोका और पथराव किया।ये युवक सेना का जवान है और जम्मू कश्मीर में तैनात है।देश के लिए मर मिटने को तैयार जवान का दोष यही था कि वह दलित जाति का था।सैनिक का अपमान वो भी गाँधी और पटेल की जन्म भूमि पर !ये कैसा गुजरात मॉडल पेस किया है।

गंगा जल और गोमूत्र की चिंता!दलितों की क्यों नहीं

  1. ये कैसा गुजरात मॉडल?

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में देश को गुजरात मॉडल की तर्ज पर विकसित झरने का जोर-सोर से प्रचार किया गया ।ऐसा लग रहा था गुजरात टोक्यो या अमरीका के कोई स्मार्ट सिटी हो।गुजरात मॉडल की हकीकत तब सामने आई जब 11 जुलाई 2016 को गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के ऊना शहर में गोरक्षा के नाम पर दलित समुदाय के 7 युवाओं को ऊंची जाति के हिन्दू गोरक्षकों ने बुरी तरह रॉड से पीटा और उनके कपड़े फाड़कर बस्ती में लोगों के सामने घुमाया गया।इस घटना से देश के दलित समुदाय में गहरा आक्रोश  पनपा था।उस घटना से व्यथित होकर  पीड़ित परिवार के पीयूष सरवैया सहित सैकड़ों लोगों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

http://www.dalitdastak.com/dalit-liberty-from-hindutva-to-buddhism-2353

2-शहीद का अपमान अपने ही गाँव में नहीं मिली दो गज जमीन।

27 जून 2016 को पंजाब केसरी में उपरोक्त हेडलाइन छपी थी ।समाचार को पढ़कर हैरानी हुई आखिर किस ओर जा रहा है 21वीं सदी का हिन्दू समाज?जम्मू कश्मीर के पम्पोर में सीआरपीएफ पर हुए हमले में शहीद हुए जवान वीर सिंह के अंतिम संस्कार के लिए दबंग और ऊँची जाति के लोगों ने जमीन देने से मना कर दिया।गुजरात मॉडल की तर्ज पर ये घटना उत्तरप्रदेश के शिकोहाबाद की है।मातृभूमि के लिए शहीद हुए सैनिक के लिए अपनी ही मातृभूमि में अंतिम संस्कार को दो गज जमीन नसीब नहीं हुई  और हम ढोल पीट-पीट कर विश्व गुरु और हिन्दू राष्ट्र की बात कर रहे हैं ।

क्यों होता है दलितों के साथ काफिरों सा व्यवहार?

अथर्वेद में लिखा है-समानी प्रपा सह वो नभाग:

समाने योक्त्रे सह वो युनजिम्म।

स्मयनचो अग्नि सपर्यतारा नाभिमिवादभीत:।।

अर्थात-हे मनुष्यो ,तुम लोगों की पानी पीने और भोजन करने की जगह एक ही है।समान धुरा में मैंने तुम सबको समानता से जोट दिया है ।जिस प्रकार चक्र के बीच अरे जमे रहते हैं,उसी प्रकार तुम भी एक जगह एकत्र होकर अग्नि में हवन करो।

एक  धर्म,एक राष्ट्र,एक संविधान और एक ही ब्रह्मा की संतानें होते हुए भी भारत में दलित समयदाय के साथ काफिरों जैसा बर्ताव किया जाता है आखिर क्यों?चुनावों में हिन्दू मुस्लिम का ध्रुवीकरण कर चुनाव जीते जाते है।मगर चुनावों के बाद ऐसा लगता है दलित वर्ग हिन्दू न होकर अलग सम्प्रदाय और विधर्मी लोग हैं।ये किस तरह की मानसिकता और धारणाएं हिंदुत्व के अंदर व्याप्त हैं कि इंसान -इंसान के बीच भेदभाव और नफरत व्याप्त है।

देश की सर्वोच्च संस्था संसद में दलित बैठ सकता है।सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की कुर्शी पर बैठ सकता है।मगर ऊँची जाति के लोगों के सामने कुर्शी पर बैठकर खाना नहीं खा सकता है और घोड़ी पर नहीं चढ़ सकता है।कैसा न्यू इंडिया बनाने जा रहे हैं हम?

सामाजिक एकता के बिना राष्ट्रीय एकता मुश्किल।

राष्ट्रीय एकता के लिए सामाजिक एकता जरूरी है।स्वाभिमानी मनुष्य को दरिद्रता उतनी नहीं दुःख देती जितना कि पग-पग पर होने वाला उसका सामाजिक तिरस्कार।यही कारण है कि राष्ट्रीय एकता ,भावनात्मक एकता और देशभक्ति का तुमुल नाद करते हुए भी वास्तविक एकता नहीं हो पाई।आज कोई भी नेता और दल हो अपने वोट के लिए जाति पर ही निर्भर रहता है।चीन और पाकिस्तान का हवा दिखाकर लोगों में जो अस्थायी जोश उतपन्न कर दिया जाता है उसे देखकर यह समझ लेना भूल है कि राष्ट्र संगठित हो गया।समाज रूपी शरीर में जात-पांत मूलक ऊंच -नीच की दरारें इस जोस को कभी स्थायी बनने नहीं देती।इस जात-पात के रहते राष्ट्रीय एकता संभव नहीं दिखती।

इतिहास से सबक लेने की जरूरत।

इतिहास बताता है कि संसार की 21 सभ्यताओं में से 19 का नाश बाहरी आक्रमणों से नहीं वरन उनकी अपनी ही भीतरी फूट के कारण हुआ है जो राष्ट्र भीतर से जर्जर ईद दुर्बल और कटा हुआ है जिसकी निवासियों में समता बंधुता और स्वतंत्रता नहीं उनकी रक्षा परमाणु शस्त्रों से भी नहीं हो सकती इस समय भारत की भीतरी फूट का प्रधान कारण इसकी जात पात की भावना है ।किसी हिंदू का राष्ट्र उसकी अपनी ही छोटी सी बिरादरी है। जात -पात भारत का महा भयंकर रोग है यह हिंदुओं की हड्डियों में बुरी तरह समा गया है इसे दूर करने के लिए जनता और सरकार दोनों को तन- मन- धन -से प्रयत्न करना चाहिए .

सरकार को चाहिए कि जो संगठन या व्यक्ति जात-पात के उन्मूलन के लिए समतामूलक समाज की स्थापना के लिए कार्य कर रहे हैं उनको प्रोत्साहन देकर पुरस्कृत करें और जात पात के बंधन को तोड़ कर हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का काम करें.तभी असली राष्ट्रवाद और विश्व बंधुत्व की भावना का प्रसार हो पायेगा।

सरदार पटेल की गगन चुम्बी मूर्ति से क्या सीख मिली:गुजरात मॉडल और  देश को?

स्टेच्यू आफ यूनिटी की मूर्ति।

चीन स्थित स्प्रिंग टेंपल की 153 मीटर ऊंची बुद्ध प्रतिमा के नाम अब तक सबसे ऊंची मूर्ति होने का रिकॉर्ड था. मगर सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा ने अब चीन में स्थापित इस मूर्ति को दूसरे स्थान पर छोड़ दिया है. 182 मीटर ऊंचे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का आकार न्यूयॉर्क के 93 मीटर उंचे ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से दोगुना है.

कितनी विडम्बना है कि”यूनिटी के प्रतीक सरदार पटेल की मूर्ति तो विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है मगर उनकी धरती पर कितनी यूनिटी आयी है ये बखान करने की जरूरत नहीं।जितनी ऊंची मूर्ति उतनी ही ज्यादा धूर्त का व्यवहार जाति के नाम पर कुछ तो सबक लेने की जरूरत है।क्या सरदार पटेल एक सौनिक का अपने ही राज्य में ऐसा अपमान सहन कर पाते?

वर्तमान में सबसे प्रचंड बहुमत  के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी  गुजरात जन्म भूमि और कर्म भूमि रही है ।ऐसे में दलितों के साथ अमानवीय और अपमानजनक घटनाएं घटित हो रही हैं तो कहीं न कहीं दाल में काला जरूर नजर आता है।तभी तो ये कहने  का मौका मिला है कि-सैनिक का अपमान :ये कैसा गुजरात मॉडल?

Sochbadlonow

I am I.P.Human My education is m.sc.physics and PGDJMC I am from Uttarakhand. I am a small blogger

2 thoughts on “सैनिक का अपमान:ये कैसा गुजरात मॉडल?

  • 22 February 2020 at 12:15 pm
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    बेहतरीन, सटीक लेख

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