डॉ अंबेडकर के विचार
डॉ अंबेडकर के कडुवे अनुभव
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डॉ अंबेडकर के विचार (Thoughts of dr.Ambedker) सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं बल्कि समाज के किसी भी क्षेत्र में वंचित समुदाय के लिए प्रेरणास्रोत हैं.उन्होंने मानवता के सम्मान और अधिकारों के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया .

डॉ अंबेडकर के विचार

   डॉ भीमराव अंबेडकर (Dr.BHIMRAW AMBEDAKAR)विश्व के लिए ज्ञान के प्रतीक हैं,मगर हिंदुस्तान में वे जाति के प्रतीक बना दिये गए हैं.कोलंबिया यूनिवर्सिटी से लेकर लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उन्होंने डिग्रियां प्राप्त की थी.डॉ अंबेडकर विश्व के पहले व्यक्ति हैं जिनको लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से Doctor  of science की डिग्री मिली.

   भारतीय सामाजिक वर्गभेद के शिका र होते हुए भी उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा.विषमता की गहरी खाई को लाँघकर डॉ अंबेडकर ने 32 डिग्रियां हांसिल की.भारत का संविधान बनाया और देश के पहले कानून मंत्री बने.

 जानते हैं डॉ अंबेडकर के विचार और उनके कड़वे अनुभव जो हिंदू समाज ने उनको दिए.

 डॉ अंबेडकर के विचार कोई एक धारणा मात्र नहीं हैं,बल्कि उनके कड़वे अनुभवों और संघर्ष की जीती -जागती तस्वीर हैं.–

“मुझे संस्कृत भाषा पर अत्यंत अभिमान है ,और मैं चाहता था कि संस्कृत भाषा का अच्छा विद्वान बनूं. परन्तु संस्कृत ब्राह्मण  अध्यापक ने कहा कि अछूत लड़के को संस्कृत नहीं सिखाऊंगा. ब्राह्मण अध्यापक के संकुचित दृष्टिकोण से मुझे  संस्कृत भाषा से वंचित रहना पड़ा”.

“मैं अंग्रेजी अच्छी तरह लिखता-बोलता हूं,ऐसा समझा जाता है.परन्तु मेरे पिता ने मुझे शब्दों का समुचित प्रयोग करना जैसे सिखाया ,वैसे किसी भी अध्यापक ने नहीं सिखाया”.

” मैं दिन भर निवास के लिए स्थान प्राप्त करने की कोशिश करता रहा, परंतु मुझे कहीं भी जगह नहीं मिली. मैं कई मित्रों से मिला. उन्होंने कई बहाने बनाकर मुझे टरका दिया, और मैं नहीं सोच पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए? आखिर में एक जगह  नीचे बैठ गया .मेरा मन  उद्विग्न हुआ और मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.”

“अछूत समाज की प्रगति में बाधक बनने वाली कोई भी व्यक्ति या संस्था हो,वह चाहे अछूत समाज की हो या सवर्ण हिन्दू समाज की,उसका हमें तीव्र विरोध तथा निषेध करना चाहिए.अब आपको अपने पांव पर खड़ा होने की कोशिश करनी चाहिए”.

“यदि लोकमान्य तिलक अछूतों में पैदा होते ,तो वह ‘स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’यह आवाज बुलंद न करते,बल्कि उनका सर्वप्रथम नारा होता’अछूतपन का खात्मा करना मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ .

” हम तालाब पर इसके जाना चाहते हैं कि हम भी औरों की तरह मनुष्य है और मनुष्य की तरह जीना चाहते हैं .अछूत समाज हिंदू धर्म के अंतर्गत है या नहीं, इस प्रश्न का हम हमेशा के लिए फैसला करना चाहते हैं.”(महाड़ सत्याग्रह पर बोलते हुए डॉ अंबेडकर के विचार)

” मैं एक बहादुर सैनिक का पुत्र हूं, कायर नहीं हूं. मेरा चाहे जो हो, मैं मौत के भय से यहां से नहीं हट सकता.दूसरों को खतरे में डाल कर अपनी जान बचाने वाला मैं नहीं हूँ.”(नासिक सत्याग्रह के समय)

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गोलमेज सम्मेलन में डॉ अंबेडकर के भाषण:

” हमारी हालत गुलामों से भी बदतर है. गुलामों के मालिक उनको छूते थे, परंतु हमको छूना भी पाप समझा जाता है. डेढ़ सौ वर्ष के ब्रिटिश राज्य में हमारी हालत ‘जैसी थी’ वैसी रही है. ऐसी सरकार से हमारा क्या भला होगा ? आज अछूत भी मौजूदा राज्य के स्थान पर जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का राज्य चाहते हैं. मजदूर और किसानों का शोषण करने वाले पूंजीपति और जमीदारों की रक्षक सरकार हम नहीं चाहते. वह जमाना बीत गया जब आप फैसला करते थे और भारतवर्ष मानता था. वह जमाना अब कभी लौटेगा नहीं”.

 डॉ अंबेडकर के धार्मिक विचार:

” यदि हिंदू धर्म अछूतों  का धर्म है, तो उसको सामाजिक समानता का धर्म बनना होगा, इसके लिए  चातुर्वर्ण्य के   सिद्धांत को जो जातिभेद तथा अस्पृश्यता का जनक है, मटियामेट करना होगा. चातुर्वर्ण्य और जातिभेद  दोनों  अछूतो के आत्मसम्मान के विरुद्ध है.”

” एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को इतना अधिक पतित समझे कि उनको छूने से इंकार करें, ऐसी प्रथा हिंदू धर्म और हिंदू समाज के सिवा कहीं अन्यत्र भी मिलेगी क्या? सब में ईश्वर मानने वाले और आचरण से मनुष्य को पशुतुल्य मानने वाले लोग पाखंडी हैं. हिंदू धर्म मेरी बुद्धि को जचता नहीं,स्वाभिमान को भाता नहीं”.

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धर्म परिवर्तन की घोषणा:

14 अक्टूबर 1956 को डॉ अंबेडकर बौद्ध बन गए.आखिर क्यों ऐसी परिस्थिति आयी कि उनको हिंदू धर्म त्यागना पड़ा. जानते हैं डॉ अंबेडकर के विचार .

” दुर्भाग्य से मैं हिंदू समाज में अछूत पैदा हुआ, यह मेरे बस की बात नहीं थी, परंतु हिंदू समाज में बने रहने से इंकार करना मेरे बस की बात है और मैं निश्चित तौर पर कहता हूं कि मैं मरते समय हिंदू नहीं रहूंगा. यदि साक्षात ईश्वर भी आकर कहे कि हिंदू धर्म को मत छोड़ो, तो मैं उसकी भी नहीं सुनूंगा”.

डॉ अंबेडकर के विचार

डॉ अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएं:(22 VOW OF DR.AMBEDKAR)

आज ही के दिन 14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया था.जिसकी घोषणा उन्होंने 1935 में ही कर दी थी.उनका हिन्दू धर्म से पलायन करना बहुत बड़ा सन्देश देती है.बचपन से लेकर अंतिम क्षणों तक वे हिंदुत्व की वर्णव्यवस्था और भेदभाव के शिकार हुए.उन्होंने बहुत प्रयास किया हिन्दू धर्म में सुधार और जातिव्यवस्था को समाप्त करने का,परन्तु कोई भी हिंदू नेता ,यहां तक कि महात्मा गांधी भी वर्णव्यवस्था को कायम रखने के पक्षधर थे.

    जब तमाम प्रयास और संघर्ष के फलस्वरूप भी हिंदू धर्म में असमानता और अश्पृश्यता बिल्कुल भी नहीं रुकी तो,डॉ अंबेडकर ने देश के अछूतों को हिंदू धर्म को त्यागने और बौद्ध धर्म अपनाने की अपील की.साथ ही 22 प्रतिज्ञाएं भी लीं जानें उनकी क्या थी 22 प्रतिज्ञाएं?जानें डॉ अंबेडकर के विचार

  1. मैं ब्रह्मा विष्णु महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और ना मैं उनकी पूजा करूंगा.
  2. मैं राम और कृष्ण को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और मैं उनकी पूजा करूंगा.
  3. मैं गौरी गणपती इत्यादि देवी देवताओं को नहीं मानूंगा मैं उनकी पूजा करूंगा.
  4. ईश्वर ने कभी अवतार लिया है, मैं इस पर विश्वास नहीं करूंगा.
  5. मैं भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार कभी नहीं मानूंगा. मैं ऐसे  प्रचार को पागलपन और झूठा प्रचार समझता हूं.
  6. मैं श्राद्ध कर्म कभी नहीं करूंगा और ना कभी पिंड दान करूंगा.
  7. मैं बौद्ध धर्म के विरुद्ध किसी बात को भी नहीं मानूंगा.
  8. मैं कोई भी क्रिया- कर्म ब्राह्मणों के हाथों से नहीं कराऊंगा .
  9. मैं, सभी मनुष्य एक समान है इस सिद्धांत को मानूंगा.
  10.   मैं समाज में समानता की स्थापना के लिए प्रयत्न करूंगा.
  11. मैं भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग का पूर्ण पालन करूंगा .
  12. मैं भगवान बुद्ध की बताई हुई 10  पारक्रमताओं का पूर्ण पालन करूंगा.
  13. मैं प्राणी मात्र पर दया रखूंगा और उनका लालन-पालन करूंगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूंगा.
  15. मैं व्यभिचार नहीं करूंगा.
  16. मैं झूठ नहीं बोलूंगा .
  17. मैं शराब इत्यादि नशीली वस्तुओं का सेवन नहीं करूंगा.
  18. मैं अपने जीवन को बौद्ध धर्म के तीन तत्व ज्ञान, शील, करुणा पर ढालने का प्रयत्न करूंगा.
  19. मैं मनुष्य मात्र के उत्कर्ष के लिए हानिकारक और मनुष्य मात्र को असमान और नीच मानने वाले अपने पुराने धर्म का पूरी तरह त्याग करता हूं और बौद्ध धर्म को स्वीकार करता हूं.
  20. मेरा ऐसा पूर्ण विश्वास है कि बौद्ध धर्म ही सदधर्म है.
  21. मैं ऐसा मानता हूं कि मेरा पुनर्जन्म हो रहा है .

22.मैं यह पवित्र प्रतिज्ञा करता हूं कि आज से मैं बौद्ध धर्म की शिक्षा के अनुसार आचरण करूंगा.

        निष्कर्ष:

डॉ0 भीमराव अंबेडकर एक उच्च कोटि के विद्वान और समाज सुधारक थे.उन्होंने लाख कोशिश की कि हिंदू सवर्ण अछूतों के लिए मन्दिर,तालाब आदि सार्वजनिक स्थलों को खोल दें.इसलिए उन्होंने महाड़,नासिक आदि सत्याग्रह भी किये.आज भी डॉ अंबेडकर के विचार और आदर्शों पर चला जाये तो,समाज से विषमता की खाई मिट सकती है.बौद्ध धर्म कोई विदेशी धर्म नहीं है.इसकी जड़ें bharat में ही पनपी हैैं.इसलिये ये कहना उचित नहींं कि बाबा साहेब  dr.BHIMRAW AMBEDKAR नेे बौद्ध धर्म अपनाकर गलत kiya.unhone prachin bhart ke gaurav shali dharm ko hi ग्रहण किया.

 

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