प्रथम भारत रत्न विजेता रागोपालचारी{1954}:कैसे बने थे चक्रवर्ती?जानें सच

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1954 में भारत के तीन महान विभूतियों को भारत रत्न पुरस्कार प्रदान किये गए .सी राजगोपालाचारी उनमें से एक प्रथम भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त कर्ता थे.अन्य दो व्यक्तियों में डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन और महान भौतिक विज्ञानी सीवी रमन थे.

प्रथम भारत रत्न विजेता:सी राजगोपालाचारी
सी राजगोपालाचारी:फोटो साभार विकिपीडिया
स्मरणीय बिंदु

    प्रथम भारत रत्न का जीवन परिचय:

    सी.राजगोपालाचारी के बचपन का नाम राजन था.उनका जन्म10 दिसंबर सन 1878 को सेलम जिले के थोरापल्ली गांव में हुवा था.उनकी माँ का नाम श्रृंगारअम्मा था पिता का नाम चक्रवर्ती आयंगर था.उनका बचपन अपने दो भाइयों और चचेरी बहन नामगिरी के साथ बीता.

    राजन(राजगोपालाचारी )की शिक्षा:

    उनकी प्राथमिक शिक्षा उनके पैतृक गाँव थोरापल्ली में ही हुई.राजन बचपन से ही मेधावी थे.लेकिन उनकी आँखें बचपन में कमजोर थी.उनके पिता ने आगे की पढ़ाई जे लिए होसुर के स्कूल में भेज दिया.

    मैट्रिक परीक्षा :-

    एक कहावत है-“होनहार बिरवान के होत चीकने पात”राजन ने अपनी प्रतिभा बचपन ही साबित कर दी.उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पहले ही प्रयास में पास कर ली.जबकि उन दिनों मैट्रिक की परीक्षा बहुत ही कठिन समझी जाती थी,और बहुत कम बच्चे फके प्रयास में इसको उत्तीर्ण कर पाते थे.खुद राजा जी के भाई ने 12 प्रयास में मैट्रिक परीक्षा पास की थी,तथा छोटे भाई ने 8वें प्रयास में.1892 ने उन्होंने सेंट्रल कालेज ,बंगलोर(मंगलुरू) से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की.

    स्नातक की पढ़ाई:

    स्नातक की पढ़ाई के लिए राजन(प्रथम भारत रत्न) को मद्रास भेज दिया गया.मद्रास के प्रेसिडेंसी कालेज से 1996 में इन्होंने बहुत अच्छे अंकों के साथ स्नातक की डिग्री पूरी की.

    तमिल भाषा से प्रेम:

    राजाजी गोपालचाचारी की पढ़ाई अंग्रेजी माध्य्म से हुई थी.स्नातक में भाषा के रूप में तमिल को चुना था.लेकिन तमिल भाषा में उनके कम अंक आये, उनको बहुत निराशा हुई,और ग्लानि भी.क्योंकि तमिल उनकी मातृ भाषा थी.वे दुबारा परीक्षा में बैठे और तमिल विषय को पास कर लिया.,तमिल साहित्य उनका रूचिकर विषय था.आगे चलकर उन्होंने तमिल भाषा में खूब साहित्य लिखा.

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    विधि कालेज में दाखिला और स्वामी विवेकानन्द से मुलाकात:

    राजा जी सी.राजगोपालाचारी को वकील बनने का काफी शौक रहा.कानून की पढ़ाई जे लिए उन्होंने 1897 में मद्रास के लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया.उनको कालेज के ही हॉस्टल में रहने को कमरा भी मिल गया .

    एक बार विवेकानंद जी उनके कालेज में आये थे.स्वामी विवेकानंद जी हॉस्टल जे सभी छात्रों को उनके कमरे में जाकर हाल-समाचार पूछ रहे थे.जब वे राजगोपालाचारी के कमरे में गए तो,उन्होंने देखा कि उनके कमरे में श्री कृष्ण के नीले रंग की तस्वीर टँगी हुई थी.

    प्रथम भारत रत्न सी राजगोपालाचारी और विवेकानंद जी
    स्वामी विवेकानंद और सी राजगोपालाचारी

    स्वामी जी ने अचानक राजन से पूछा,”कृष्ण जी का रंग नीला क्यों है?”

    राजा जी ने समुद्र की ओर इशारा करते हुए उत्तर देते हुए कहा,”श्रीमान, समुद्र अंनत है.और आकाश भी समुद्र की भांति अंनत है.इन दोनों का ही रंग नीला है.इन्हीं की भांति श्री कृष्ण भी अंनत हैं.इसलिए उनका रंग नीला है.

    स्वामी विवेकानंद उनके इस प्रकार के उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए और प्रभावित भी हुए,उन्होंने इस भावी प्रथम भारत रत्न को आशीर्वाद देते हुए कहा,-“यह छात्र बहुत तेज बुद्धि वाला है.एक दिन यह ऊँचे मुकाम तक पहुंचेगा”स्वामी जी के बोल सच साबित हुए.यह बालक आगे चलकर स्वतन्त्र भारत के प्रथम गवर्नर -जनरल तथा प्रथम भारत रत्न बने.

    विवाह बंधन:

    जब वे लॉ कॉलेज में अध्ययन कर रहे थे उस वक्त उनकी उम्र 18 साल थी.माता -पिता ने उनकी शादी अलूमेलु मंगामल नाम की लड़की से कर दिया.चूंकि उस वक्त समाज में बालविवाह का प्रचलन था,तो लड़की की उम्र महज 10 वर्ष थी.

    जाति से बहिष्कृत हुए उनके पूर्वज क्यों?

    उन दिनों समाज में जात-पात और छुआछुत चरम पर थी.समाज में अंधविश्वास लोगों के रोम-रोम में बसा था,हालांकि भारत में अभी भी जातिवाद और भेदभाव,अंधविश्वास व्याप्त है.मगर संविधान और कानून के डर से कुछ कम हुवा है,और शिक्षा का प्रसार भी अधिक हुवा है.

    कहानी इस प्रकार है-‘एक बार उनके एक पूर्वज थोरापल्ली गांव के पास से बहने वाली पिनाकिनी नदी में ना रहे थे .तभी उसे नदी में बह रही एक लाश दिखाई दी . उसने सोचा अगर इस लाश को कौओं और गिद्धों ने खा लिया तो यह धर्म के खिलाफ होगा .यह सोचकर वह तैरते हुए उस लाश के पास पहुंचा और काफी मेहनत के बाद उसको खींच कर तट पर ले आया .

    फिर उसने चिता जलाकर शास्त्रसम्मत रीति से उस शव का दाहसंस्कार कर दिया’यह खबर उनके गाँव तक फैल गयी.गाँव के ब्राह्मणों ने पता लगा लिया कि वह लाश किसी नीची जाति के मनुष्य की थी.भारत में नीची जाति के लोगों को छूना धर्म के विरुद्ध माना जाता था और आज भी है,बशर्ते जानवर और कुत्तों को पालने ,छूने से धर्म नहीं अपवित्र होता है.

    राजगोपालाचारी जो प्रथम भारत रत्न थे,उनके पूर्वज को उनकी बिरादरी ने जाति से बहिष्कृत कर दिया.जाति से बाहर होने के बाद उंसके किसी भी कर्म-कांड और संस्कार, तथा श्राद्ध पर भी अन्य ब्राह्मणों ने आना बंद कर दिया.उनका परिवार अलग थलग पड़ गया .

    चक्रवर्ती बनने की कहानी:

    चूँकि उनका परिवार भी हिन्दू धर्म के ब्राह्मण जाति से था.हिन्दू धर्म में श्राद्ध के मौके पर ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान-दक्षिणा देना पुण्य समझा जाता है.जिससे कि उनके पूर्वजों का तारण हो सके.

    लेकिन उनके पूर्वजों के घर कोई ब्राह्मण नहीं गया.वे बहुत निराश हुए.तभी किसी ने उनका द्वार खटखटाया .ब्राह्मण ने दरवाजा खोला तो बाहर ,दिव्य ज्योति मुखमंडल वाले पण्डित को खड़ा देखा.वह बोला “चिंता मत करो मैं तुम्हारे घर श्राद्ध पूजा कराऊंगा और भोजन भी करूँगा.”

    उस पण्डित की बात सुनकर गरीब ब्राह्मण की आँखों में आँसू आ गए.भोजन करने के बाद जाते समय वह गरीब ब्राह्मण को आशीर्वाद देते हुए बोला,”तुम बहुत अच्छे ब्राह्मण हो .अब चक्रवर्ती भी बनो.”यह कहकर वह पण्डित घर से बाहर निकला और अचानक ओझल गया. ये घटना अन्य लोगों ने भी देखा.उस दिन के बाद उस परिवार के लोग चक्रवर्ती कहे जाने लगे.

    उनके पूर्वज जातिभेद,अंधविश्वास, छुवाछूत के घोर विरोधी थे,समानता और मानवता उनकी रग-रग में भर हुई थी.देश के प्रथम भारत रत्न रागोपालचारी पर भी ये गुण परिलक्षित हुए.वे जीवन पर्यन्त समाज में छुवाछूत और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध लड़ते रहे.वास्तव में वे प्रथम भारत रत्न ही नहीं, समाज के अनमोल रत्न भी थे.

    अगले अंक में–जारी प्रथम भारत रत्न राजगोपालाचारी का राजनीतिक सफर और सामाजिक संघर्स.पत्नी की मृत्यु .पढ़ना न भूलें


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