आजादी के बाद नेहरू की विदेश नीति क्यों कहा था युद्ध को वरदान?

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पंडित जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति ‘न काहू से दोस्ती न काहू से प्यार’की नीति पर आधरित थी.भारत की आजादी 15 अगस्त 1947 से पहले तक देश के नीति निर्माता अंगेज ही थे.आजादी के बाद पण्डित नेहरू के हाथ में आजाद भारत की बागडोर सँभालने की जिम्मेदारी मिली.भारत तमान प्रकार की समस्याओं से घिरा हुवा था.देश के भीतर शिक्षा,स्वास्थ्य, रोजगार और संशाधनों की भारी कमी थी,ये स्वाभिक ही था कि अंगेजों ने सिर्फ अपने काम चलाने लायक ही अवसर पैदा किये थे.द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत आजाद हुवा था.विश्व परिदृश्य में हिंदुस्तान एक नए सवेरे की तरह था,उसको देश के अंदर और देश की सीमाओं के बाहर भी बेहतर सम्बन्ध बनाने की जरूरत थी.

प0 नेहरू की विदेश नीति का सिद्धान्त:

प0 नेहरू की विदेश नीति में रंगभेद,उपनिवेशवाद तथा फासीवाद कुछ ऐसे बिंदु थे जिनका उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंचों से खुलकर खिलाफत की थी.वे विश्व भवन भाई-चारा और शांति के पक्षधर रहे हैं.’न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ की भावना ही नेहरू की विदेश नीति का मूल मंत्र था.इतिहासकार बिपिन चन्द्र अपनी किताब ‘आजादी के बाद भारत’ अध्याय 12 में नेहरू की विदेश नीति पर लिखते हैं-“जहां तक फासिज्म ,उपनिवेशवाद और रंगभेद की बुरी ताकतों या न्युक्लियर बम और हमलों के सवाल हैं,हम जोरदार तरीके से और बिना किसी दुविधा के उनके खिलाफ हैं—हम शीतयुध्द और सैनिक गुटों से ही दूर रहते हैं. एशिया एयर अफ्रीका के नए राष्ट्रों को शीतयुध्द की मशीन का पुर्जा बनने पर मजबूर करने का हम विरोध करते हैं.वैसे भी, हम हर उस चीज का विरोध करने के लिये आजाद हैं,जिसे हम दुनिया या अपने लिए गलत या हानिकारक समझ्ते हैं,और जब कभी जरूरत पड़ती है,हम इस आजादी का इस्तेमाल करते हैं.

प0 जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति 'न काहू से दोस्ती न काहू से बैर'की नीति पर आधारित थी.उनकी जिंदगी में बुद्ध की शिक्षाओं का असर था.
प0 जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति

नेहरू की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताऐं:

आजादी से पहले 1946 में जब पण्डित नेहरू अंतरिम सरकार के मुखिया बने तभी से भारत की विदेश नीति की झलक दिखाई देने लगी थी.पंडित नेहरू का साफ शब्दों में ये कहना था कि-स्वतंत्र भारत विदेशी नीतियों के सम्बंध में एक स्वतंत्र नीति का अवलंबन करेगा और किसी गुट में सामिल नहीं होगा.नेहरू द्वारा अपनायी गई कुछ विदेश नीति के कुछ बिंदु निम्नवत हैं.

देश के आर्थिक हितों की रक्षा:

नेहरू की विदेश नीति में देश के आर्थिक हित सबसे ऊपर थे.उनका लक्ष्य था भारत के आर्थिक हितों को आगे बढ़ाना और उस रास्ते को मजबूत करना जो उसने चुना था.गुटों से दूर रहने की नीति ने जरूरत पड़ने पर दोनों ही पक्षों के देशों के साथ आर्थिक सम्बंध कायम करने में सहायता की.आवस्यकता पड़ने पर उसे पूँजी, टेक्नोलॉजी, मशीनें एवं अनाज पश्चिमी देशों से मिले.

देश की प्रतिरक्षा के लिए कदम:

पण्डित नेहरू की विदेश नीति में देश की प्रतिरक्षा सबसे महत्वपूर्ण थी.जिसके लिए पुरजोर कदम उठाए गए।देश की सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए नेहरू जी ने हर विचारधारा के देशों से सम्पर्क स्थापित किया.नेहरू के समय में वायु सेना के लिए फ्रांस से 104 तूफानी हवाई जहाज,ब्रिटेन से 182 हंटर और 80 कैनबेरो, फ्रांस से 110 मिस्टर्स, रूस से 16 ए,. एन-12और 26 एमआई -4हेलीकॉप्टर, तथा अमरिका से 55 फेयरचाइल्ड पैकेट खरीदे.सेना के तीनों अंगों को मजबूत करने के लिए कई डील की गई.

इतना ही नहीं नेहरू की विदेश नीति के तहत देश में ही रक्षा से संबंधित निम्न सामन बनाने का लाइसेंस हांसिल कर लिया.-

  • ब्रिटेन से नेट इंटरसेप्टर हवाई जहाज, ब्रिटेन से ही एच एस-748 मालवाहक हवाई जहाज,
  • फ्रांस से अंतुले हेलीकॉप्टर,
  • रूस से मिग हेलीकॉप्टर, स्वीडेन से एल-70विमान-भेदी तोपें,
  • ब्रिटेन से विजयन्ता2 टैंक, जर्मनी से शक्तिमान ट्रक
  • जापान – से मिस्सान एक टन वाला ट्रक और जोंगा-जीप तथा अन्य देशों से वायरलेस सेट ख़रीदे गए .
आजादी के बाद  नेहरू की विदेश नीति में रक्षा उपकरणों पर  विशेष बल दिया गया था

पंचशील सिद्धान्त:

पण्डित जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति में बौद्ध धर्म के पंच शील तत्वों की साफ झलक दिखाई देती है सन 1954 से भारत की विदेश नीति को ‘पंचशील ‘के नियमों ने एक नई सोच और दिशा प्रदान की .बौद्ध धर्म में पंचशील व्यक्ति के आचरण के उत्थान के लिए व्रत रूप में धारण किया जाता है.उसी प्रकार नेहरू के पंचशील के सिद्धांत अंतर्राष्टीय देशों के आचरण के लिए निर्धारित किये गए.जानें पंचशील के पांच सिद्धान्त:-

  1. एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और सर्वोच्च सत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान की भावना.
  2. अनाक्रमण
  3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना.
  4. समानता एवं पारस्परिक लाभ
  5. शान्तिपूर्ण सह -अस्तित्व.

नेहरू की विदेश नीति ,निष्कर्ष:

भारत की प्राचीन संस्कृति ‘वशुधैव कुटम्बकम’ की भावना से ओत प्रोत रही है.प्राचीन काल से ही भारत के विदेशों से अच्छे सम्बंध रहे हैं.चाहे व्यापार हो या कला ,साहित्य पश्चिमी देशों के साथ निरन्तर बिना किसी बाधा के होते रहा है.इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि-भारत का बौद्ध धर्म एशिया सहित अन्य देशों में फला फ़ूला. आजादी के बाद नेहरू ने इसी बौद्ध नीति को चीन के साथ अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाया.नेहरू जी हमेशा देश के लिए चिंतित रहते थे.वो भारत को रुग्ण,गरीब,और भूखा नही देखना चाहते थे.इसी लिए उन्होंने आजादी के बाद भारत में औधौगिक क्रांति के लिए नीतियाँ बनानी आरंभ कर दी.नेहरू नए भारत का निर्माण करने में लगे रहे,और पड़ोसी देश उनको धोखा देते रहे .पाकिस्तान तो आजादी के बाद से ही भारत का जन्मजात विरोधी बन गया था.नेहरू की विदेश नीति की कुछ लोग आलोचना करते हैं,मगर वे लोग आजादी के बाद नेहरू द्वारा खड़े किए गए नव भारत को भुला देते हैं.

पण्डित नेहरू ने राष्टवाद का प्रचार नहीं किया,वरन खुद राष्ट्रवाद के उदाहरण बन गए अपनी जिंदगी से ज्यादा वो भारत की उन्नति के लिए समर्पित थे.

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क्यों कहा नेहरू ने चीन युद्ध को वरदान?

सन 1962 के आम चुनाव से पहले नेहरू जी शख्त बीमार हो गए थे,फिर भी उन्होंने लोकतन्त्र की मजबूती और देश की प्रगति के लिए चुनावों में भागीदार की.उनकी सरकार पर उनके ही दामाद (इंदिरा गांधी के पति) फिरोज गांधी ने भ्र्ष्टाचार के आरोप लगाए थे,फिर भी काँग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ तीसरी बार सत्ता में आयी थी लेकिन 1962 का साल उनके लिए अच्छा साबुत नहीं हुआ चीन ने धोखे से भारत पर आक्रमण कर दिया.नेहरू जी ने युद्ध के बारे में कभी सोचा भी न था, वे देश को आर्थिक रूप से मजबूत करने में लगे थे .सेना पर ज्यादा व्यय नहीं हो रहा था,लेकिन 1962 के चीन युद्ध ने उनकी आंखें खोल दी,उन्होंने इसी परिपेक्ष्य में कहा था कि;चीन का युद्ध उनके लिये वरदान सिद्ध हुआ ,क्योंकि उस युद्ध के बाद नेहरू ने सेना के विस्तार के लिए तथा आधुनिकरण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए.

इस प्रकार नेहरुबकी विदेश नीति का ही परिणाम है कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर आज भी हर फोरम में भारत की बात सुनी जाती है .


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